बेंगलुरु और उसके आसपास के जिलों में इन दिनों अन्नदाता एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं। कर्नाटक के गन्ना किसानों ने चीनी मिलों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। किसानों का साफ कहना है कि मिल मालिक उनका बकाया पैसा तुरंत चुकाएं। लंबे समय से भुगतान न मिलने के कारण किसानों के सामने अपने परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है।
राज्य सरकार ने हाल ही में आम और अन्य फसलों के लिए समर्थन मूल्य में कुछ राहत देने की कोशिश की है। इसके बावजूद गन्ने के बकाया भुगतान का मामला अब भी एक बड़ा संकट बना हुआ है। किसानों का आरोप है कि सरकार और मिल मालिक दोनों मिलकर उनकी अनदेखी कर रहे हैं। इस वजह से ग्रामीण इलाकों में तनाव का माहौल बनता जा रहा है।
चीनी मिलों के खिलाफ सड़कों पर फूटा गुस्सा
राजधानी बेंगलुरु से लेकर ग्रामीण इलाकों तक किसान संगठन लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनका बकाया पैसा जल्द नहीं मिला तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। मिल मालिकों का तर्क है कि चीनी की कम बिक्री और लागत बढ़ने के कारण वे भुगतान करने में असमर्थ हैं। लेकिन किसान इस दलील को मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर, राज्य में कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर भी माहौल गर्म चल रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर शिव राजकुमार, दर्शन और सुदीप जैसे बड़े कन्नड़ फिल्म अभिनेता भी खुलकर किसानों के पक्ष में बोल चुके हैं। कलाकारों ने जनता से अपील की है कि किसानों के हितों की रक्षा करना समाज की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
मैदान पर उतरी हस्तियां और समर्थन मूल्य का सवाल
किसानों की इन समस्याओं के बीच सरकार की तरफ से कुछ फसलों पर राहत पैकेज का ऐलान भी किया गया है। अधिकारियों का दावा है कि किसानों को सीधा फायदा पहुंचाने के लिए काम किया जा रहा है। हालांकि, मैदानी हकीकत यह है कि छोटे किसानों तक यह सरकारी मदद समय पर नहीं पहुंच पा रही है। बिचौलियों और जटिल नियमों के कारण आम किसान आज भी परेशान है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब ग्रामीण इलाकों का दौरा किया तो पता चला कि कर्ज के बोझ तले दबे किसान हर साल अपनी फसल बेचने के बाद भी घाटे में रहते हैं। खाद, बीज और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा तय किया गया समर्थन मूल्य भी उनके पूरे साल की मेहनत का सही मोल नहीं दे पा रहा है।
आगे की राह और प्रशासन की तैयारी
प्रशासन ने प्रदर्शन कर रहे किसानों से बातचीत का दौर शुरू कर दिया है। पुलिस और स्थानीय अधिकारी यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि कानून व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े। किसानों की साफ मांग है कि सरकार बीच का रास्ता निकाले और मिलों पर दबाव बनाकर उनका एक-एक रुपया वापस दिलाए। आने वाले दिनों में यह आंदोलन राजनीतिक रूप भी ले सकता है, जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।






