बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक की राजनीति और कानूनी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए अनुसूचित जाति यानी एससी और अनुसूचित जनजाति यानी एसटी के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने सख्त फैसले में साफ कर दिया है कि किसी भी स्थिति में पचास प्रतिशत आरक्षण की तय सीमा को तोड़ा नहीं जा सकता है। यह पूरा मामला पिछले कुछ महीनों से लगातार चर्चा में बना हुआ था और अब अदालत के इस रुख के बाद राज्य सरकार की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कई कानूनी और संवैधानिक पहलू रखे गए थे। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि आरक्षण का दायरा पचास प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाना संविधान के बुनियादी ढांचे और नियमों के खिलाफ है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस फैसले को असंवैधानिक करार दिया है। अदालत ने माना कि सरकार का यह कदम तयशुदा नियमों के दायरे से बाहर था, इसलिए इसे कानूनी रूप से बरकरार नहीं रखा जा सकता है। इस आदेश के आने के बाद अब राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी तेजी से शुरू हो गया है।
पचास प्रतिशत की सीमा को नहीं लांघ सकती सरकार
अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इसी बात पर जोर दिया कि कानूनन पचास प्रतिशत की जो ऊपरी सीमा तय की गई है, वह सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होती है। कर्नाटक सरकार ने चुनावी मौसम और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए एससी और एसटी जातियों का कोटा बढ़ाने का फैसला किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बिना पुख्ता और मजबूत आंकड़ों के आधार पर कोटे की सीमा को बढ़ाना कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। अदालत के इस कड़े रुख से साफ हो गया है कि न्यायिक समीक्षा के दौरान नियमों की अनदेखी करना सरकारों के लिए आसान नहीं होगा।
विपक्षी दलों और जानकारों का मानना है कि इस फैसले से सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होते हैं। जब यह फैसला लिया गया था, तभी कई कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि यह मामला अदालत में टिक नहीं पाएगा। अब हाईकोर्ट का यह आदेश आने के बाद वे तमाम आशंकाएं सच साबित हो गई हैं। राज्य सरकार के नुमाइंदों का कहना है कि वे इस पूरे फैसले की कॉपी का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। इसके बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई या सुप्रीम कोर्ट जाने को लेकर कोई पक्का फैसला लिया जाएगा।
आरक्षण बढ़ाने के फैसले पर कानूनी शिकंजा
कर्नाटक सरकार ने जिस समय एससी और एसटी आरक्षण को बढ़ाने का ऐलान किया था, उसे एक बड़ा सामाजिक न्याय का कदम बताया गया था। सरकार का तर्क था कि इन दोनों समुदायों की आबादी और उनकी वास्तविक सामाजिक स्थिति को देखते हुए कोटे को बढ़ाना बहुत जरूरी था। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि कानूनी दांवपेंच में यह फैसला उलझ गया। हाईकोर्ट के इस ताज़ा फैसले के बाद अब उन युवाओं और छात्रों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं जिन्हें इस बढ़े हुए कोटे के तहत आगे चलकर सरकारी नौकरियों या शिक्षण संस्थानों में दाखिला मिलने की उम्मीद बंध रही थी।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस मसले पर स्थानीय लोगों और छात्रों से बात की, तो उनकी निराशा साफ झलक रही थी। बहुत से लोगों का कहना है कि सरकारों को कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले तमाम संवैधानिक पहलुओं की जांच बहुत सावधानी से करनी चाहिए ताकि बाद में इस तरह की निराशा का सामना न करना पड़े। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का रुख करती है या फिर कोई नया रास्ता निकालती है।
आगे की राजनीतिक और कानूनी राह
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कर्नाटक की सियासत में उबाल आना तय माना जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर से बयानों के तीर चलने शुरू हो गए हैं। जहां एक तरफ विपक्षी दल सरकार को घेरने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार अपने वकीलों के साथ लगातार बैठकें कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस कानूनी चुनौती का मुकाबला करने के लिए क्या नया कदम उठाती है। द फ्रीलान्स इस मामले पर लगातार नजर बनाए रखेगा और हर नई अपडेट सबसे पहले आप तक पहुंचाता रहेगा।




