बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक की राजनीति और कानूनी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक बहुत बड़ा झटका दिया है। अदालत ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानी एससी और एसटी जातियों के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले फैसले को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य में आरक्षण के मुद्दे पर पहले से ही काफी गहमागहमी बनी हुई थी। अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाले कोटे पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
मामले की गहराई में जाएं तो पिछली सरकार ने एससी और एसटी समुदायों की आबादी का हवाला देते हुए उनके कोटे को बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया था। इसके तहत एससी आरक्षण को पंद्रह प्रतिशत से बढ़ाकर सत्रह प्रतिशत और एसटी आरक्षण को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया गया था। लेकिन इस फैसले को कानूनी चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह बदलाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और कुल आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत के आंकड़े को पार कर रही है। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आखिरकार इस बदलाव को अवैध करार दे दिया है।
पचास प्रतिशत की तय सीमा को तोड़ना अवैध
अदालत ने अपने फैसले में बहुत साफ शब्दों में कहा है कि देश का संविधान आरक्षण की पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा तय करता है। कोई भी राज्य सरकार विशेष परिस्थितियों का हवाला देकर भी इस तय सीमा को पार नहीं कर सकती है। कोर्ट ने माना कि सरकार का यह कदम संवैधानिक प्रावधानों के दायरे से बाहर था। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला उन सभी राज्यों के लिए एक बड़ा संदेश है जो राजनीतिक फायदे के लिए कोटे की सीमा को बढ़ाना चाहते हैं। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब राज्य सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है कि वह इस मामले में आगे क्या कानूनी कदम उठाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। सरकारी वकील और कानूनी सलाहकार इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जाए या नहीं। दूसरी तरफ, उन छात्रों और नौकरी चाहने वालों की चिंताएं फिर से बढ़ गई हैं जो बढ़े हुए कोटे के तहत राहत की उम्मीद लगाए बैठे थे। विपक्ष की पार्टियों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि सरकार ने बिना पुख्ता कानूनी तैयारी के सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए यह फैसला लिया था।
आरक्षण बढ़ाने के फैसले के पीछे की पूरी कहानी
अगर इतिहास पर नजर डालें तो कर्नाटक सरकार ने चुनावों से ठीक पहले सामाजिक न्याय का हवाला देते हुए कोटे में बढ़ोतरी का यह दांव चला था। सरकार का दावा था कि राज्य में इन दोनों जातियों की आबादी काफी ज्यादा है, इसलिए उन्हें उनकी संख्या के हिसाब से ज्यादा हक मिलना चाहिए। लेकिन अदालत की चौखट पर यह फैसला टिक नहीं पाया। संविधान पीठ के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि पचास प्रतिशत की दीवार को लांघना आसान नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना किसी पुख्ता और वैज्ञानिक आंकड़े के इस तरह के बड़े बदलाव नहीं किए जा सकते हैं।
आम जनता के बीच भी इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे संविधान और कानून के दायरे का सही पालन बता रहे हैं, तो वहीं प्रभावित समुदायों के लोग इसे अपने अधिकारों के साथ अन्याय मान रहे हैं। कई सामाजिक संगठनों ने इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरने की चेतावनी भी दी है। उनका कहना है कि वे अपने हक की लड़ाई को और तेज करेंगे। आने वाले दिनों में यह मुद्दा कर्नाटक की सियासत को पूरी तरह गरमा सकता है और इस पर तीखी बयानबाजी देखने को मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में कर्नाटक सरकार
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, कर्नाटक सरकार इस फैसले को इतनी आसानी से मानने के मूड में नहीं है। सरकार के भीतरूनी सूत्रों का कहना है कि जल्द ही इस आदेश को देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। सरकार वहां यह साबित करने की कोशिश करेगी कि राज्य के पास विशेष आंकड़े मौजूद हैं जो इस बढ़े हुए कोटे को सही ठहराते हैं। हालांकि, तब तक के लिए राज्य में भर्ती प्रक्रियाएं और दाखिले प्रभावित हो सकते हैं। इस पूरी कानूनी लड़ाई पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है क्योंकि इसका असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है।





