नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घमासान शुरू हो गया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक तीखा पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने आगामी परिसीमन विधेयक और संसद के विशेष सत्र बुलाए जाने के सरकार के कदम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। खरगे ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकार को संसद में जबरन कोई भी बिल पास कराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। राजनीतिक गलियारों में इस पत्र के सामने आने के बाद हलचल तेज हो गई है और विपक्षी दल एकजुट होकर सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी चिट्ठी में इस बात पर भी बड़ा ऐترض जताया है कि मॉनसून सत्र के खत्म होने के बाद भी उसका औपचारिक अवसान क्यों नहीं किया गया। उनका कहना है कि संसद के नियमों और परंपराओं को ताक पर रखकर अचानक विशेष सत्र की रूपरेखा तैयार करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। विपक्षी दलों का मानना है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर देश के सभी राज्यों और राजनीतिक दलों के साथ खुलकर चर्चा होनी चाहिए। जल्दबाजी में उठाए गए ऐसे कदम देश के संघीय ढांचे के लिए ठीक नहीं हैं, खासकर तब जब दक्षिण भारतीय राज्यों की तरफ से इसे लेकर पहले से ही चिंताएं जाहिर की जा रही हैं।
परिसीमन और लोकसभा सीटों का भविष्य
खरगे ने अपने पत्र में इस बात पर खास जोर दिया है कि लोकसभा सदस्यों की संख्या और राज्यों के पुनर्गठन से जुड़े मामलों पर अगले पच्चीस सालों की दूरदृष्टि के साथ विचार होना चाहिए। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के नियमों का ईमानदारी से पालन किया है, उन्हें परिसीमन के नाम पर राजनीतिक नुकसान नहीं होना चाहिए। अगर सरकार बिना किसी व्यापक आम सहमति के अपने बहुमत के बल पर ऐसा कोई कानून पास करवाती है, तो इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में गहरा असंतोष फैल सकता है। कांग्रेस पार्टी का यह रुख साफ करता है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर सरकार को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि खरगे का यह दांव सरकार की रणनीतिक चालों को मात देने के लिए एक बड़ा राजनीतिक कदम है। एक तरफ जहां भाजपा सरकार अपनी विधाई एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश में है, वहीं विपक्ष इसे लोकतंत्र और राज्यों के अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है। संसद के इस संभावित विशेष सत्र से पहले विपक्षी दलों की आपसी बैठकों का दौर भी शुरू हो गया है, ताकि सरकार के खिलाफ एक मजबूत और साझा रणनीति बनाई जा सके। जनता के बीच भी इस बात की चर्चा है कि क्या इतनी बड़ी नीतिगत बदलाव पर सचमुच पर्याप्त चर्चा का मौका दिया जाएगा या नहीं।
संसदीय परंपराएं और सरकार की रणनीति
देश के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी बड़े विधाई सुधार को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आए हों। लेकिन परिसीमन और सीटों के बंटवारे का मुद्दा सीधे तौर पर देश की चुनावी नुमाइंदगी से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि इसे लेकर राजनीतिक दलों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। खरगे के इस पत्र ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या बहुमत का मतलब हर फैसले को बिना व्यापक चर्चा के लागू करना होता है। सरकार की तरफ से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक और विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने बैठकों का दौर तेज हो गया है।
हमारे ग्राउंड रिपोर्टर्स के मुताबिक, दिल्ली के राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा गरम है कि क्या सरकार अपने तय कार्यक्रम के अनुसार ही आगे बढ़ेगी या विपक्ष के इस दबाव के आगे झुकते हुए कुछ बदलाव करेगी। आने वाले दिनों में यह मुद्दा देश की मुख्य धारा की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाला है। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही संसद के इस सत्र या सरकार की ओर से कोई नया आधिकारिक बयान आएगा, हम सबसे पहले आप तक उसकी जमीनी सच्चाई पहुंचाएंगे।










