मुंबई और नई दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से सरगर्मी तेज हो गई है। महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना के असली वारिस होने का दावा करने वाले एकनाथ शिंदे गुट ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। कोर्ट में शिंदे गुट के वकीलों ने साफ तौर पर कहा है कि पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर उनका पूरी तरह से स्वाभाविक हक बनता है। यह पूरा मामला चुनाव आयोग के उस फैसले के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है जिसमें शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया था। इस कानूनी दांव-पेंच के बीच राज्य की राजनीति में हर दिन नए समीकरण बनते और बिगड़ते नजर आ रहे हैं। आम आदमी के मन में अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस कानूनी लड़ाई का आने वाले दिनों में क्या असर होगा।
दूसरी तरफ, महाराष्ट्र के विधान परिषद चुनावों से पहले ruling महायुति गठबंधन के अंदर भी घमासान मचा हुआ है। गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर आपसी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। स्थिति तब और दिलचस्प हो गई जब महायुति के कई बागी नेताओं ने भी अपने पर्चे दाखिल कर दिए। इससे चुनावी मुकाबला काफी कड़ा हो गया है और बड़े दलों के नेताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छोटे दलों और बागी उम्मीदवारों की इस बगावत से वोटों का समीकरण बदल सकता है। गठबंधन के वरिष्ठ नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं ताकि चुनाव में पार्टी को नुकसान से बचाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट में पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर कानूनी जंग
शिवसेना के भीतर शुरू हुई बगावत अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच चुकी है। चुनाव आयोग द्वारा शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह दिए जाने के फैसले को उद्धव ठाकरे गुट ने चुनौती दी थी। इसके जवाब में अब शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी मजबूत दलीलें पेश की हैं। शिंदे गुट का तर्क है कि पार्टी के अधिकांश विधायक और सांसद उनके साथ हैं, इसलिए संगठन पर उनका ही हक है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में कोर्ट का फैसला भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। इस बीच, विधानसभा स्पीकर के अयोग्यता मामलों पर आए फैसलों को लेकर भी कानूनी चर्चाएं गर्म हैं।
अदालत में चल रही इन बहसों के बीच राजनीतिक दलों की नजरें पूरी तरह से न्यायपालिका के अगले कदमों पर टिकी हैं। यदि स्पीकर का फैसला या चुनाव आयोग का निर्णय किसी भी स्तर पर बदलता है, तो महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ सकता है। यही वजह है कि दोनों ही गुट अपनी कानूनी टीम को मजबूत करने में लगे हैं। आम लोग और पार्टी कार्यकर्ता भी असमंजस में हैं कि आखिर आने वाले दिनों में पार्टी का आधिकारिक भविष्य क्या होगा। अदालत की हर एक तारीख पर राज्य के राजनीतिक भविष्य का फैसला टिका हुआ है।
महायुति गठबंधन में टिकट बंटवारे पर रार और बागियों की बगावत
विधान परिषद के आगामी चुनावों ने महायुति गठबंधन की एकता की पोल खोल दी है। सीट शेयरिंग के फार्मूले से असंतुष्ट कई स्थानीय नेताओं और सहयोगियों ने बगावत का झंडा उठा लिया है। स्थिति यह है कि आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ कई बागी नेताओं ने भी अपने नामांकन पत्र दाखिल कर दिए हैं। इससे गठबंधन के भीतर आपसी अविश्वास साफ तौर पर देखा जा सकता है। विरोधी दल इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की फिराक में हैं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस आंतरिक कलह को शांत करने के लिए लगातार मैराथन बैठकें कर रहे हैं।
गठबंधन के नेताओं का दावा है कि समय रहते सभी बागियों को मना लिया जाएगा और चुनाव में कोई दिक्कत नहीं आएगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष लगातार बढ़ रहा है। बागी उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय या बेहद रोचक हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते इन असंतुष्टों को नहीं मनाया गया, तो चुनाव परिणाम उम्मीद के विपरीत आ सकते हैं। गठबंधन की साख दांव पर लगी है और हर नेता अपनी रणनीति को दुरुस्त करने में जुटा हुआ है।
सूखे से निपटने की तैयारी और किसानों को राहत देने का वादा
राजनीतिक उठापटक के बीच सरकार का प्रशासनिक कामकाज भी चल रहा है। राज्य के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात और किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार गंभीर नजर आ रही है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हाल ही में किसानों को आश्वस्त किया है कि इस मुश्किल वक्त में सरकार पूरी तरह उनके साथ खड़ी है। उन्होंने वादा किया है कि किसानों की दिवाली काली नहीं होने दी जाएगी और उन्हें हरसंभव आर्थिक मदद पहुंचाई जाएगी। सरकार सूखा प्रभावित इलाकों में राहत कार्यों को तेज करने के निर्देश दे चुकी है।
किसानों का कहना है कि बयानों से ज्यादा उन्हें जमीन पर ठोस मदद की जरूरत है। फसल खराब होने के बाद से ही किसान परिवार भारी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। विपक्षी दल भी सरकार के इस मोर्चे पर लगातार हमलावर हैं और मुआवजे की मांग कर रहे हैं। प्रशासन अब यह सुनिश्चित करने में लगा है कि सरकारी सहायता का पैसा सीधे किसानों के खातों तक पहुंचे। राजनीतिक ड्रामे के बीच आम जनता और किसानों की यह फिक्र सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।




