नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश की राजधानी में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने मोर्चा खोल दिया है। इस विरोध प्रदर्शन की आंच अब देश की सीमाओं को लांघकर पाकिस्तान, ब्रिटेन और अन्य देशों के मीडिया तक पहुंच गई है। विदेशी मीडिया हाउस इस बात पर हैरानी जता रहे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव संस्थाओं पर इस तरह के सवाल क्यों उठ रहे हैं।
कुछ दिन पहले ही जेल से रिहा होने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बहुत तीखा बयान दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कटघरे में खड़ा करने की बात कही है। राहुल गांधी ने कहा कि वे इन सभी को देश की जनता के सामने जवाबदेह बनाएंगे। उनके इस बयान के बाद देश की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है और कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।
विदेशी मीडिया में भारत के चुनावी संग्राम की चर्चा
ब्रिटेन के प्रमुख मीडिया संस्थानों और पड़ोसी देश पाकिस्तान के अखबारों में भारत के इस सियासी घमासान को प्रमुखता से जगह दी गई है। पाकिस्तानी मीडिया इस बात को लेकर विशेष रुचि दिखा रहा है कि भारतीय विपक्ष किस तरह मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर हमलावर है। वहीं ब्रिटिश मीडिया का यह मानना है कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में इस तरह का टकराव दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के लिए एक बड़ा विषय बन गया है। विश्लेषक मान रहे हैं कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहस छिड़ गई है।
दूसरी तरफ भारत के भीतर भी विपक्ष का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी चुनाव आयोग पर बड़ा हमला बोला है। इन सभी बड़े नेताओं ने एक सुर में मांग की है कि हालिया चुनाव परिणामों की पारदर्शिता संदिग्ध है और देश में दोबारा चुनाव कराए जाने चाहिए। इन नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर रहा है और सरकार के दबाव में फैसले ले रहा है।
जेन ज़ी के आंदोलन और बदलती राजनीतिक भाषा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच देश के युवाओं यानी जेन ज़ी के आंदोलन पर भी खास चर्चा हो रही है। जानकारों का कहना है कि भारत में विरोध जताने का तरीका अब पूरी तरह बदल गया है। युवा सड़कों पर उतरने के साथ-साथ सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। विरोध की यह नई भाषा सरकार और प्रशासन दोनों के लिए एक नई चुनौती बनकर सामने आ रही है। युवा अब सीधे डिजिटल माध्यमों से अपनी बात पूरी दुनिया तक पहुंचा रहे हैं।
ज्ञानेश कुमार के करियर और उनके चुनाव आयोग में आने के सफर को लेकर भी तमाम तरह की बातें सामने आ रही हैं। जब से आयोग के भीतर मतभेद की खबरें बाहर आईं, तब से विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। विपक्षी दलों का यह प्रतिनिधिमंडल लगातार राष्ट्रपति और अन्य संवैधानिक संस्थाओं से मिलकर अपनी शिकायत दर्ज करा रहा है। उनका साफ कहना है कि जब तक चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता साबित नहीं करता, तब तक उनका यह विरोध प्रदर्शन देश भर में जारी रहेगा।
सड़क से लेकर संसद तक गूंजेगा यह मुद्दा
हमारी जमीनी पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है। विपक्ष की रणनीति साफ है कि वे इस मुद्दे को आसानी से ठंडे बस्ते में नहीं जाने देंगे। सरकार विरोधी दलों के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है और इसे चुनावी हार की झुंझलाहट बता रही है। लेकिन जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसमें रुचि दिखाई है, उससे सरकार पर भी कूटनीतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। आने वाला समय देश की राजनीति के लिए बेहद उथल-पुथल भरा रहने वाला है।


