इस्लामाबाद और रावलपिंडी से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर यह है कि पाकिस्तान की सत्ता की असली कमान अब पूरी तरह सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के हाथों में आ गई है। पिछले कुछ हफ्तों से देश के राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज थी कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अब ताजा घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को दरकिनार करते हुए अहम फैसले सीधे जनरल मुख्यालय से लिए जा रहे हैं। इस बदलाव का असर केवल देश की अंदरूनी राजनीति पर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की विदेश नीति पर भी साफ नजर आ रहा है।
कूटनीतिक सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, इस बड़े राजनीतिक फेरबदल के बाद अब पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा संबंधों को एक नया मोड़ दिया जा रहा है। जनरल मुनीर ने सऊदी अरब के साथ अपनी सैन्य साझेदारी को और मजबूत करने का फैसला किया है। इसके तहत आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया के इस देश में पाकिस्तानी सेना के जवानों की संख्या में भारी बढ़ोतरी की जाएगी। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार इस पूरे मामले में केवल एक दर्शक की भूमिका में नजर आ रही है और उसे इन फैसलों की जानकारी बहुत बाद में दी जा रही है।
सेना प्रमुख के सीधे नियंत्रण में खाड़ी देशों के साथ रक्षा सौदे
पाकिस्तान में इतिहास गवाह रहा है कि जब भी हुकूमत कमजोर होती है, सेना सीधी दखलंदाजी बढ़ा देती है। मौजूदा हालात में आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए विदेशी मुद्रा कमाना और बड़े देशों से आर्थिक मदद पाना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। खाड़ी देशों के साथ होने वाले सभी रणनीतिक और सैन्य समझौतों की कमान अब सीधे रावलपिंडी से चलाई जा रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय इस नीतिगत बदलाव के आगे पूरी तरह बेबस नजर आ रहा है।
सऊदी अरब के साथ होने वाले नए सैन्य समझौते के तहत पाकिस्तानी फौज के अतिरिक्त जवानों को वहां तैनात किया जाएगा। यह तैनाती मुख्य रूप से रणनीतिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग के दायरे में आती है। जानकारों का मानना है कि इसके बदले में पाकिस्तान को सऊदी अरब से वित्तीय सहायता और तेल आपूर्ति में बड़ी राहत मिल सकती है। हालांकि, इन बड़े फैसलों में निर्वाचित प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सहमति या उनकी कैबिनेट की सलाह की अनदेखी की गई है, जिससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
पाकिस्तान की संसद और अवाम के बीच बढ़ती नाराजगी
इस पूरे घटनाक्रम पर देश की जनता और विपक्षी दलों में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। आम नागरिकों का मानना है कि देश की चुनी हुई सरकार को इस तरह से कमजोर करना और हर फैसले के लिए सेना पर निर्भर होना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। महंगाई और बेरोजगारी से पहले ही त्रस्त जनता अब इस बात से चिंतित है कि देश की विदेश और रक्षा नीति का नियंत्रण पूरी तरह वर्दीधारी अधिकारियों के हाथ में जाने से आम आदमी के जीवन पर इसका क्या असर पड़ेगा।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बात का संदेश जा रहा है कि पाकिस्तान में असली हुक्मनान कौन है। विदेशी मेहमान और कूटनीतिक प्रतिनिधि अब प्रधानमंत्री या मंत्रियों से मिलने के बजाय सीधे सैन्य नेतृत्व से संवाद स्थापित कर रहे हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में यह तनाव और ज्यादा बढ़ सकता है, क्योंकि सत्ता के इस संघर्ष में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का राजनीतिक वजूद लगातार कमजोर होता जा रहा है।
रक्षा नीति पर सेना का एकाधिकार और क्षेत्रीय समीकरण
पाकिस्तान की सुरक्षा नीति हमेशा से सेना के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन हालिया महीनों में जिस तरह से प्रधानमंत्री को हर मोर्चे पर दरकिनार किया गया है, वह अभूतपूर्व है। सऊदी अरब में अतिरिक्त फौज भेजने का यह फैसला केवल एक सैन्य कदम नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में पाकिस्तान की स्थिति को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है। सेना प्रमुख यह जताना चाहते हैं कि वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान की असली ताकत केवल सेना के साथ खड़े होने में ही है।
जैसे-जैसे यह मामला तूल पकड़ रहा है, इस्लामाबाद के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम हो गई है कि क्या शहबाज सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी या फिर पर्दे के पीछे से पूरी सरकार को सीधे सेना ही चलाएगी। हमारे रिपोर्टर्स की नजर इस बात पर भी है कि इस रणनीतिक बदलाव के बाद भारत और अन्य पड़ोसी देशों के साथ पाकिस्तान के संबंधों पर इसका क्या असर पड़ेगा। फिलहाल, रावलपिंडी का पलड़ा पूरी तरह भारी है और प्रधानमंत्री कार्यालय मूकदर्शक बनकर रह गया है।




