नई दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैले प्रशासनिक गलियारों से इन दिनों बेहद चौंकाने वाली खबरें सामने आ रही हैं। देश भर में सरकारी और जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों से जुड़े मामले चर्चा का विषय बने हुए हैं। एक तरफ जहां तंत्र की सुस्ती और लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों पर जानलेवा हमलों और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों ने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। द फ्रीलान्स की इस विशेष पड़ताल में हमने इन सभी मामलों की जमीनी हकीकत को टटोला है और यह जानने की कोशिश की है कि आखिर व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक कैसे हो रही है।
उत्तर प्रदेश से एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है जिसे सुनकर हर कोई दंग रह गया है। यहाँ एक महिला अधिकारी ने सिर्फ एक दिन नौकरी की और उसके बाद पिछले दस सालों से लगातार गायब चल रही थी। विभाग के तमाम अधिकारी उसे ढूंढते-ढूंढते थक गए लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। आखिरकार तंग आकर विभाग ने उस महिला अधिकारी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया है। यह घटना सीधे तौर पर सरकारी दफ्तरों में चल रही कार्यशैली और निगरानी तंत्र की बड़ी कमजोरी को उजागर करती है। दस साल तक बिना काम किए किसी का वेतन या कागजों में टिके रहना इस बात का सबूत है कि निचले स्तर से लेकर ऊपरी स्तर तक फाइलें कितनी लापरवाही से चलाई जाती हैं।
इंडियन ऑयल अधिकारी की हत्या और सुरक्षा पर सवाल
प्रशासनिक लापरवाही और अनुशासनहीनता के बीच उत्तर प्रदेश से एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ इंडियन ऑयल के एक अधिकारी को बेरहमी से सात बार चाकू घोंपकर मौत के घाट उतार दिया गया। इस दुस्साहसिक वारदात के बाद इलाके में भारी सनसनी फैल गई और लोगों में भारी गुस्सा देखने को मिला। घटना की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय मंत्री ने भी इस मामले में तुरंत रिपोर्ट तलब की है। पुलिस इस मामले की गहराई से जांच कर रही है और हत्या के पीछे की असल वजह का पता लगाने में जुटी है। इस घटना ने एक बार फिर कॉर्पोरेट और सरकारी महकमों में काम करने वाले अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक फेरबदल का दौर भी लगातार जारी है और सरकार ने एक बार फिर ट्रांसफर एक्सप्रेस चला दी है। ताजा प्रशासनिक कार्रवाई के तहत एक साथ 20 आईएएस अधिकारियों के तबादले कर दिए गए हैं। इस बड़े फेरबदल के बाद कई जिलों के पुलिस कप्तान और बड़े प्रशासनिक चेहरे बदल दिए गए हैं। सरकार का दावा है कि यह कदम कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने और प्रशासनिक कसावट लाने के लिए उठाया गया है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि बार-बार होने वाले इन तबादलों से जमीनी स्तर पर चल रही कई महत्वपूर्ण योजनाएं और जांच प्रभावित होती हैं।
भ्रष्टाचार के पुराने साये और आईएएस पूजा सिंघल का मामला
अधिकारियों से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार के पुराने और गंभीर अध्याय भी पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। बहुचर्चित आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल का मामला एक बार फिर सुर्खियों में बना हुआ है। मनरेगा घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में घिरने के बाद पूजा सिंघल को करीब 28 महीने तक जेल की हवा खानी पड़ी थी। भले ही वह अब जेल से बाहर आ चुकी हैं, लेकिन उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के दाग और कानूनी शिकंजा अभी भी पूरी तरह ढीला नहीं हुआ है। यह मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि किस तरह से सत्ता और कुर्सी के करीब बैठे लोग जनता के पैसों का दुरुपयोग करते हैं और कानून के लंबे हाथों से बचने की कोशिश करते हैं।
इन सभी प्रशासनिक हलचल के बीच चुनाव आयोग और अधिकारियों की भूमिका भी काफी अहम हो गई है। महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने हाल ही में चुनाव आयोग के सामने पांच प्रमुख मांगें रखी हैं। इन मांगों पर आयोग की उच्च स्तरीय बैठक में लंबी चर्चा हुई है और आगामी चुनावों को निष्पक्ष तथा पारदर्शी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं। चुनाव अधिकारी का यह कदम चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिहाज से बहुत अहम माना जा रहा है। कुल मिलाकर देखा जाए तो देश भर में अधिकारियों से जुड़े ये तमाम घटनाक्रम प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े सुधारों की सख्त जरूरत की तरफ इशारा कर रहे हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और निष्कर्ष
द फ्रीलान्स की इस व्यापक पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि देश में प्रशासनिक मशीनरी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक तरफ जहां दस साल तक गायब रहने वाले अधिकारी तंत्र की लापरवाही को दर्शाते हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों पर होने वाले हमले और भ्रष्टाचार के खुलासे व्यवस्था की सुरक्षा और ईमानदारी पर बट्टा लगा रहे हैं। सरकार और संबंधित विभागों को अब कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। जब तक अधिकारियों के कामकाज पर कड़ी नजर नहीं रखी जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम जनता का इस व्यवस्था पर पूरा भरोसा कायम होना मुश्किल है।



