विज्ञापन • ADVERTISEMENT
होम/देश/पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों से जंग लड़ना इतना मुश्किल क्यों हैं?
देशपढ़ने में समय: 5 मिनट

पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों से जंग लड़ना इतना मुश्किल क्यों हैं?

यमन के हूती विद्रोही मध्य पूर्व में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। अरबों डॉलर के हथियार और बड़े हवाई हमले भी इन्हें रोक नहीं पा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान जैसे देशों के लिए इनसे सीधी जंग लड़ना क्यों असंभव सा लगता है, इस रिपोर्ट में जानिए पूरी सच्चाई।
✍️
नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•7 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•35
🌐Read in English →
शेयर करें:
पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों से जंग लड़ना इतना मुश्किल क्यों हैं?
📷 पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों से जंग लड़ना इतना मुश्किल क्यों हैं? — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • यमन के हूती विद्रोही मध्य पूर्व में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। अरबों डॉलर के हथियार और बड़े हवाई हमले भी इन्हें रोक नहीं पा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान जैसे देशों के लिए इनसे सीधी जंग लड़ना क्यों असंभव सा लगता है, इस रिपोर्ट में जानिए पूरी सच्चाई।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

सना और इस्लामाबाद के बीच कूटनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है कि पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों से उलझना आखिर क्यों टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। यमन के इन लड़ाकों ने लाल सागर से लेकर खाड़ी देशों की नींद उड़ा रखी है। दुनिया भर की आधुनिक सेनाएं और अरबों के हथियार इनके आगे बेअसर साबित हुए हैं। अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन और सऊदी अरब के लंबे हवाई हमलों के बावजूद हूती कमजोर होने के बजाय और ज्यादा आक्रामक होकर उभरे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की सेना और हुक्मरानों के लिए इस दलदल में उतरना किसी बड़े खतरे से खाली नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यमन की भौगोलिक बनावट और वहां की जमीन इन विद्रोहियों की सबसे बड़ी ताकत है। जिस तरह से वियतनाम के जंगलों में विदेशी सेनाएं फंसी थीं, वैसी ही स्थिति यमन के पहाड़ी इलाकों में बनी हुई है। कहबूब पहाड़ियों और ताइज़ के जंगलों में हूती लड़ाके जिस रणनीति से लड़ते हैं, उसे समझना पारंपरिक सेनाओं के बस की बात नहीं है। इसे यमन का कारगिल भी कहा जाता है जहां स्थानीय भूगोल की जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। पाकिस्तान की सेना पारंपरिक युद्ध की आदी है, लेकिन इस तरह के गुरिल्ला युद्ध में फंसना उसके लिए भारी आर्थिक और सामरिक नुकसान का सौदा साबित हो सकता है।

यमन का कारगिल और कहबूब पहाड़ियों की कठिन जंग

यमन की पथरीली जमीन और दुर्गम पहाड़ियां युद्ध के मैदान का नक्शा पूरी तरह बदल देती हैं। कहबूब पहाड़ियों की जंग इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कैसे कम संसाधनों वाले विद्रोही भी भारी-भरकम सेनाओं को धूल चटा सकते हैं। सऊदी समर्थित सेनाओं ने इन इलाकों में महीनों तक पसीना बहाया, लेकिन हूतियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद नहीं कर सके। हूती लड़ाके गुफाओं, सुरंगों और प्राकृतिक ओट का इस्तेमाल करते हैं जहां हवाई हमले बेअसर हो जाते हैं। पाकिस्तान यदि इस मोर्चे पर अपनी सेना उतारता है, तो उसे ऐसी ही दुर्गम भौगोलिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जिससे बचना वहां के रक्षा विशेषज्ञों के लिए पहली प्राथमिकता है।

ताइज शहर से सामने आने वाली ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि वहां आम जनजीवन पूरी तरह तबाह हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद हौसले कम नहीं हुए हैं। गोलियों और बमों की गड़गड़ाहट के बीच लोग जीने की राह तलाश रहे हैं। हूती विद्रोहियों ने इस इलाके में अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग उनके समर्थन में खड़ा दिखता है। जब किसी सेना को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल न हो और सामने वैचारिक रूप से कट्टर लड़ाके हों, तो वहां जीत हासिल करना लगभग असंभव हो जाता है। पाकिस्तान की आंतरिक आर्थिक स्थिति और राजनीतिक अस्थिरता भी उसे किसी बाहरी मोर्चे पर लंबी जंग लड़ने की इजाजत नहीं देती है।

विज्ञापन • ADVERTISEMENT

संबंधित खबरें

सालों की जंग और अरबों के हथियार भी क्यों साबित हुए फेल

पिछले कई सालों से यमन में संघर्ष जारी है और दुनिया के कई ताकतवर देशों ने इस युद्ध में अपना पैसा और हथियार झोंक दिए हैं। इसके बावजूद हूती विद्रोहियों की ताकत में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि उनके पास आधुनिक ड्रोन और मिसाइलें आ गई हैं। वे खाड़ी देशों के तेल भंडारों और समुद्री जहाजों को लगातार निशाना बना रहे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने भी हूती ठिकानों पर कई बार बमबारी की, लेकिन ट्रम्प प्रशासन से लेकर मौजूदा सरकारों तक ने सीधे जमीनी टकराव से हमेशा परहेज किया है। वे जानते हैं कि यमन का दलदल एक बार पकड़ ले तो बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है।

पाकिस्तान के घरेलू मोर्चे पर हालात वैसे ही बहुत नाजुक बने हुए हैं। देश गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई और राजनीतिक खींचतान से जूझ रहा है। ऐसे समय में यमन की जंग में कूदना पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए आखिरी कील साबित हो सकता है। जनता का भारी विरोध और रक्षा बजट का भारी दबाव सरकार को ऐसा कोई भी कदम उठाने से रोकता है। हूती विद्रोहियों की मारक क्षमता और उनकी जिद्दी युद्ध शैली से पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व अच्छी तरह वाकिफ है। यही वजह है कि कूटनीतिक बयानों से आगे बढ़कर इस्लामाबाद इस मोर्चे पर सीधे सैनिक भेजने का जोखिम कभी नहीं उठाएगा।

समुद्र का सिकंदर बनने की होड़ और पाकिस्तान की सीमाएं

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्ग है। इस समंदर का सिकंदर बनने के लिए कई वैश्विक ताकतें जोर लगा रही हैं, लेकिन हूती विद्रोहियों ने इस रास्ते को अपने नियंत्रण में लेकर सबकी चालें बिगाड़ दी हैं। वे अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर हमले कर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहे हैं। इस समुद्री इलाके में सुरक्षा देना किसी एक देश के बस की बात नहीं है। पाकिस्तान की नौसेना के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह हूती ड्रोनों और मिसाइलों से लैस बेड़े का अकेले मुकाबला कर सके। क्षेत्रीय कूटनीति में संतुलन बनाए रखने के लिए भी पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग में कूदना रणनीतिक रूप से आत्महत्या जैसा होगा।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
✍️

नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस

सत्यापित संपादकीय डेस्क

राजनीतिक, नीतिगत एवं राष्ट्रीय सरोकार रिपोर्टिंग टीम

द फ्रीलांस की राष्ट्रीय संपादकीय डेस्क देश की राजनीति, संसद, नीतिगत फैसलों, केंद्रीय योजनाओं और जनसरोकार से जुड़े बड़े मुद्दों पर 24/7 निष्पक्ष, तथ्यपरक और खोजी रिपोर्टिंग करती है। यह टीम दोहरे तथ्य-सत्यापन के कठोर सिद्धांतों का पालन करती है।

❤️
100% पाठक समर्थित मीडिया

निष्पक्ष व निडर पत्रकारिता को आपका साथ चाहिए

द फ्रीलांस बिना किसी कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव के जनसरोकार की खबरें आप तक पहुँचाता है। आपका छोटा सा योगदान भी हमारी स्वतंत्रता की ताकत है।

विज्ञापन • ADVERTISEMENT

संबंधित विजुअल स्टोरीज (Web Stories)

TAP TO VIEW

संबंधित खबरें (Related Articles)

कश्मीरी गेट चुनाव आयोग दफ्तर पर आप और कांग्रेस का हल्ला बोल, बैरिकेड पर चढ़े कार्यकर्ताNATIONAL

कश्मीरी गेट चुनाव आयोग दफ्तर पर आप और कांग्रेस का हल्ला बोल, बैरिकेड पर चढ़े कार्यकर्ता

7 अक्टू॰28
प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे किए बतौर पीएम-मुख्यमंत्री 25 साल, संसद की लंबी गैर-बैठक और सियासी हलचल पर टिकी नजरेंNATIONAL

प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे किए बतौर पीएम-मुख्यमंत्री 25 साल, संसद की लंबी गैर-बैठक और सियासी हलचल पर टिकी नजरें

7 अक्टू॰25
केरल लॉटरी और स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत: क्या है 'DL72' का पूरा सचNATIONAL

केरल लॉटरी और स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत: क्या है 'DL72' का पूरा सच

7 अक्टू॰43
यूपी चुनाव से पहले एकजुट विपक्ष ने बढ़ाई एनडीए की टेंशन, क्या होगा अगला बड़ा कदम?NATIONAL

यूपी चुनाव से पहले एकजुट विपक्ष ने बढ़ाई एनडीए की टेंशन, क्या होगा अगला बड़ा कदम?

7 अक्टू॰41
प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे किए 25 साल, संसद की कार्यवाही और राजनीतिक हलचल के बीच 'न थकूंगा, न रुकूंगा' का संकल्पNATIONAL

प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे किए 25 साल, संसद की कार्यवाही और राजनीतिक हलचल के बीच 'न थकूंगा, न रुकूंगा' का संकल्प

7 अक्टू॰49
हिमालयन टॉयलेट्स में बनते थे बम और अंग्रेजों को डराती थीं दुर्गा भाभी, जिनकी बहादुरी के आगे कांपती थी हुकूमतNATIONAL

हिमालयन टॉयलेट्स में बनते थे बम और अंग्रेजों को डराती थीं दुर्गा भाभी, जिनकी बहादुरी के आगे कांपती थी हुकूमत

7 अक्टू॰28
विज्ञापन • ADVERTISEMENT