नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों तक राजनीतिक सरगर्मी इन दिनों बेहद तेज हो गई है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक सफर के 25 साल पूरे कर लिए हैं, वहीं दूसरी तरफ संसद की कार्यप्रणाली को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के दौरान 'वी विल डू इट' का जिक्र करते हुए देश के विकास के लिए बिना थके और बिना रुके काम करने का संकल्प दोहराया। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं, और उनके समर्थक इसे एक बड़े आत्मविश्वास के रूप में देख रहे हैं।
लेकिन इस सियासी उत्सव और दावों के बीच देश की संसद से जुड़े आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक मानसून सत्र स्थगित होने के बाद भी संसद की बैठकें शुरू नहीं हुई हैं और संसद को बिना किसी बैठक के 54 दिन से अधिक का समय बीत चुका है। राजनीतिक इतिहास के जानकारों का मानना है कि यह पिछले 37 सालों में संसद की बैठकों को लेकर एक लंबा अंतराल है। विपक्षी दलों और जानकारों का कहना है कि इतने लंबे समय तक संसद का सत्र न चलना और सदन में जनता के मुद्दों पर चर्चा न होना देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
संसद की लंबी गैर-बैठक पर विपक्ष का तीखा हमला
संसद के लंबे समय तक न बैठने को लेकर राजनीतिक दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलना शुरू कर दिया है। दिल्ली में हाल ही में वाम दलों और अन्य राजनीतिक संगठनों ने संयुक्त रूप से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और सरकार की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार संसद का सामना करने से बच रही है और महत्वपूर्ण विधेयकों तथा जनहित के मुद्दों पर चर्चा टालने के लिए ऐसे रास्ते अपनाए जा रहे हैं। विपक्षी नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि जनता की आवाज को इसी तरह दबाया जाता रहा, तो वे पहले की तरह सरकार को जमीन पर झुकने के लिए मजबूर करेंगे और देशव्यापी प्रदर्शनों का दौर फिर से शुरू किया जाएगा।
दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के नेताओं का कहना है कि सरकार देश के विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और नियमों के मुताबिक ही संसद के सत्र आयोजित किए जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 साल के कार्यकाल का जिक्र करते हुए भाजपा नेताओं का कहना है कि इन ढाई दशकों में देश ने हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। उनका तर्क है कि विरोधियों के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे केवल बयानबाजी के जरिए जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार के समर्थकों का दावा है कि आने वाले समय में विकास कार्यों की रफ्तार और अधिक तेज की जाएगी ताकि हर नागरिक तक इसका सीधा लाभ पहुंच सके।
जमीनी सियासत और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती सक्रियता
राष्ट्रीय राजधानी से लेकर राज्यों के स्थानीय स्तर तक राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। विभिन्न दलों और संगठनों की ओर से लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस और बैठकों का दौर जारी है। क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर भी जनता के बीच उबाल देखा जा रहा है, जहां स्थानीय संगठन अपने अधिकारों और मांगों को लेकर प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं। जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह राजनीतिक टकराव और अधिक तीखा हो सकता है, क्योंकि एक तरफ सरकार अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का ढोल पीट रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष जनता से जुड़े मुद्दों को सड़क से लेकर संसद तक उठाने की जिद पर अड़ा हुआ है।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल यह बताती है कि आम जनता के मन में इन राजनीतिक गतिविधियों को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। एक वर्ग जहां प्रधानमंत्री के लंबे राजनीतिक अनुभव और विकास के दावों से प्रभावित है, वहीं दूसरा वर्ग बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और संसद जैसी संस्थाओं के कमजोर होने को लेकर चिंतित नजर आता है। कुल मिलाकर यह समय देश की राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, जहां एक तरफ शासन के कड़े फैसले हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष का आक्रामक तेवर भी साफ दिखाई दे रहा है।
आगामी राजनीतिक रणनीतियां और जनता का रुख
आने वाले हफ्तों में देश की राजनीतिक दिशा क्या होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और विपक्ष किस तरह आमने-सामने आते हैं। दिल्ली और अन्य राज्यों में होने वाले आगामी आंदोलनों की रूपरेखा तैयार की जा रही है, और पुलिस तथा प्रशासन भी किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए अपनी तैयारियों में जुट गया है। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि राजनीति का यह पारा अभी और चढ़ेगा, और हर एक गतिविधि पर देश की जनता की गहरी नजर बनी हुई है।




