मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। पाकिस्तान ने खुद इस बात को मान लिया है कि उसकी सेना और वायुसेना के सैनिक सऊदी अरब की धरती पर तैनात हैं। यह कबूलनामा ऐसे समय में आया है जब पूरा पश्चिम एशिया गंभीर सुरक्षा संकट से गुजर रहा है। यमन के हूती विद्रोही लगातार सऊदी ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। इस बढ़ते खतरे को रोकने के लिए रियाद प्रशासन अपनी सैन्य ताकत को हर संभव तरीके से मजबूत करने में जुटा हुआ है। पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान की तरफ से आए इस बयान ने क्षेत्रीय कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है।
दूसरी तरफ, सऊदी अरब के ताकतवर युवराज मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएस ने इस जंग से निपटने के लिए एक और बड़ा कूटनीतिक दांव चला है। सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के मुताबिक, सऊदी नेतृत्व ने अब सीरिया से भी सीधी मदद मांगी है। हूती लड़ाकों के पास आधुनिक ड्रोन और मिसाइल तकनीक आ चुकी है, जिससे सऊदी तेल अड्डों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। इस साझा खतरे से पार पाने के लिए पारंपरिक सहयोगियों के अलावा अब नए क्षेत्रीय समीकरणों को साधा जा रहा है। सीरियाई सरकार के साथ सऊदी अरब का यह संपर्क इस बात का सबूत है कि इस जंग का दायरा अब लगातार बड़ा होता जा रहा है।
पाकिस्तान की सऊदी में सैन्य मौजूदगी का सच
पाकिस्तानी सेना की खाड़ी देशों में मौजूदगी हमेशा से चर्चा का विषय रही है। इस्लामाबाद और रियाद के बीच पुराने रक्षा समझौते रहे हैं जिनके तहत पाकिस्तानी सैनिक सऊदी सीमा और आंतरिक सुरक्षा में सहयोग करते आए हैं। लेकिन अब इस तैनाती को खुले तौर पर स्वीकार करना बहुत कुछ कहता है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है और उसे सऊदी अरब से वित्तीय मदद की सख्त जरूरत है। यही वजह है कि सऊदी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पाकिस्तानी फौज को मैदान में उतारा गया है। इस कदम से दक्षिण एशिया और खाड़ी के रिश्तों की नई तस्वीर दुनिया के सामने आ रही है।
हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने सऊदी अरब की नींद उड़ा दी है। अत्याधुनिक पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम होने के बावजूद कई बार ड्रोन हमले रोकने में मुश्किलें आई हैं। यही कारण है कि सऊदी हुक्मरानों को अब बाहरी और अतिरिक्त सैन्य मदद की दरकार है। सीरियाई सेना खुद लंबे समय से गृहयुद्ध और आतंकवाद से लड़ते हुए बेहद अनुभवी हो चुकी है। अगर सीरियाई लड़ाके या तकनीकी विशेषज्ञ इस मोर्चे पर सऊदी अरब का साथ देते हैं, तो यह हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक नया सामरिक मोर्चा साबित हो सकता है। हालांकि, दमिश्क और रियाद के बीच इस संभावित सहयोग पर ईरान और उसके सहयोगियों की पैनी नजर बनी हुई है।
हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की नई घेराबंदी
यमन के हूती संगठन को सीधे तौर पर ईरान का समर्थन हासिल है। यही वजह है कि लाल सागर और अदन की खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज भी सुरक्षित नहीं हैं। अमेरिकी और पश्चिमी देशों के गठबंधन के बाद अब खाड़ी के देश खुद अपनी रक्षा के लिए क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट कर रहे हैं। सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान के सैनिकों को अपने पाले में रखना और सीरिया से मदद मांगना इसी रणनीति का हिस्सा है। हूती हमलों से होने वाले आर्थिक और रणनीतिक नुकसान को रोकने के लिए सऊदी युवराज किसी भी तरह का जोखिम उठाने को तैयार दिख रहे हैं।
मैदान पर तैनात हमारे सूत्रों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम का असर आने वाले दिनों में भारत और अन्य एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। यदि खाड़ी का यह संघर्ष और ज्यादा फैला, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। पाकिस्तानी सेना की इस सक्रिय तैनाती और सीरियाई मदद की सुगबुगाहट ने यह साबित कर दिया है कि मिडिल ईस्ट की आग अब बुझने के बजाय और अधिक भड़कने की कगार पर पहुंच चुकी है। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले से जुड़े हर नए और पुख्ता अपडेट पर लगातार नजर बनाए हुए है।




