नई दिल्ली/इस्लामाबाद — अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान के बाद आखिरकार कर्ज को लेकर बड़ी डील पक्की हो गई है। कंगाल हो चुके पाकिस्तान ने फंड पाने के लिए आईएमएफ के सामने तमाम कड़ी शर्तें मान ली हैं जिसके बाद उसे 1.21 अरब डॉलर की आर्थिक मदद मिलने का रास्ता साफ हो गया है। देश की बिगड़ती आर्थिक हालत को सुधारने के लिए शहबाज शरीफ सरकार लंबे समय से इस पैसे के लिए जुगत लगा रही थी ताकि विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ हद तक बचाया जा सके।
पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस कर्ज समझौते के तहत आईएमएफ ने देश पर कई कड़े वित्तीय प्रतिबंध और शर्तें लगाई हैं। पाकिस्तान को अपनी घरेलू टैक्स प्रणाली सुधारनी होगी और बिजली-गैस के दामों में भारी बढ़ोतरी करनी होगी। आम जनता पहले से ही महंगाई की मार झेल रही है और इन नई शर्तों के लागू होने से वहां के लोगों की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ सकती हैं। सरकार के सामने देश को दिवालिया होने से बचाने का इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।
सऊदी अरब में भेजी सेना और रक्षा समझौते
एक तरफ जहां पाकिस्तान आर्थिक मदद के लिए आईएमएफ के दरवाजे पर खड़ा है, वहीं दूसरी तरफ वह सामरिक मोर्चे पर भी बड़े कदम उठा रहा है। हाल ही में सामने आई खबरों के मुताबिक पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ जंग लड़ने के लिए सऊदी अरब में अपनी फौज उतार दी है। इस सैन्य दस्ते में जेएफ-17 फाइटर जेट, आधुनिक ड्रोन और करीब 15000 सैनिक शामिल हैं। जानकारों का मानना है कि विदेशी कर्ज और आर्थिक मदद के बदले में खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा समझौतों को मजबूत करना पाकिस्तान की पुरानी रणनीति का हिस्सा रहा है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख लगातार मध्य पूर्व के देशों के साथ अपने रिश्ते बेहतर करने में लगे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें आर्थिक और सैन्य समर्थन मिलता रहे। क्या भारत से संभावित जंग की स्थिति में सऊदी अरब और तुर्किए पाकिस्तान का साथ देंगे? इस सवाल पर रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी के देश अपने व्यापारिक और कूटनीतिक हितों को पहले रखते हैं और केवल सैन्य टुकड़ी भेजने भर से वे किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध में सीधे तौर पर कूदने का जोखिम शायद ही उठाएं।
संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को लगा बड़ा झटका
आर्थिक मोर्चरी की बदहाली और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटती साख के बीच पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधारों के मामले में बड़ा झटका लगा है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने अपने एक बयान में सुरक्षा परिषद में सुधारों को लेकर सीधे तौर पर भारत के रुख का समर्थन किया है। भारत लंबे समय से वीटो पावर और स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी मजबूती से पेश कर रहा है और यूएन प्रमुख के इस रुख से इस्लामाबाद खेमे में भारी सदमे का माहौल है।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की कूटनीति अब पूरी तरह लड़खड़ा चुकी है। एक तरफ देश को चलाने के लिए आईएमएफ के आगे हाथ फैलाने पड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ वैश्विक मंचों पर भारत का कद लगातार बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र में समर्थन न मिलने से पाकिस्तान के अधिकारी खासे परेशान हैं क्योंकि कश्मीर और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर उन्हें अब दुनिया भर में अकेलापन महसूस हो रहा है।
कंगाल अर्थव्यवस्था और आगे की बड़ी चुनौतियां
आईएमएफ से मिलने वाले 1.21 अरब डॉलर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए केवल एक तात्कालिक मरहम का काम करेंगे। देश का विदेशी कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है और पाकिस्तान के पास अपने पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं। पाकिस्तान के व्यापारी और आम नागरिक सरकार की आर्थिक नीतियों से पूरी तरह त्रस्त हो चुके हैं। आयात और निर्यात का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है जिससे रोजमर्रा की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि अगर पाकिस्तान ने अपनी आंतरिक व्यवस्था और टैक्स चोरी के मामलों पर सख्ती नहीं की, तो यह नया कर्ज भी कुछ ही महीनों में खत्म हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी इस बात को भली-भांति जानता है इसीलिए उसने इस बार पाकिस्तान पर निगरानी रखने के लिए बेहद कड़े नियम बनाए हैं। आने वाले दिनों में पाकिस्तानी अवाम को और अधिक महंगाई और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है।






