नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश में खाने के तेल की बढ़ती कीमतों और विदेश पर निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स – ऑयल पाम' को मंजूरी दे दी है। इस योजना का मकसद देश के भीतर ही पाम ऑयल का बंपर उत्पादन करना है ताकि आम आदमी को महंगा तेल न खरीदना पड़े। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर खाने का तेल विदेशों से मंगवाता है जिस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने पर देश की रसोई का बजट बिगड़ जाता है। सरकार इस नई योजना के जरिए इस पुरानी कमजोरी को दूर करने की पूरी तैयारी में जुटी हुई है।
इस योजना के तहत सरकार देश के किसानों को पाम ऑयल की खेती करने के लिए सीधे आर्थिक मदद देगी। किसानों को शुरुआती दौर में पौधे खरीदने से लेकर खाद और सिंचाई तक के लिए पैसे दिए जाएंगे ताकि उन्हें खेती में कोई आर्थिक परेशानी न हो। उत्तर-पूर्व के राज्यों और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में इस खेती को बढ़ावा देने पर खास जोर दिया जा रहा है। सरकार का मानना है कि इन इलाकों की आबोहवा पाम ऑयल की खेती के लिए एकदम सही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसानों को सही समय पर सही मदद मिल गई तो आने वाले कुछ सालों में देश तेल उत्पादन के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर हो जाएगा।
सस्ते आयात से बाजार को राहत देने की कोशिश
एक तरफ देश में खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ तुरंत राहत के लिए आयात के नियमों में भी बड़े बदलाव किए गए हैं। सरकार ने व्यापारियों को बिना किसी लाइसेंस के रिफाइंड पाम ऑयल देश में लाने की छूट दे दी है। यह नियम तय समय सीमा तक लागू किया गया है ताकि बाजार में तेल की कोई कमी न हो और कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर न जाएं। जब वैश्विक बाजार में दाम बढ़ते हैं तो व्यापारी बिना रुकावट के देश में माल मंगा सकते हैं। इससे त्योहारी सीजन या मांग बढ़ने के समय कालाबाजारी और मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने में काफी मदद मिलती है।
हालांकि बिना लाइसेंस आयात की इस नीति को लेकर बाजार के जानकारों की अपनी अलग राय है। कुछ स्थानीय व्यापारी और कृषि संगठन मानते हैं कि अगर बाहर से बहुत सस्ता तेल आता है तो देश के अपने किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाएगा। किसान संगठन इस बात से डरे हुए हैं कि अगर आयातित तेल सस्ता होगा तो मिल मालिक स्थानीय किसानों से ऊंचे दामों पर पाम ऑयल के फल खरीदने से कतराएंगे। सरकार के सामने इस वक्त दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे आम जनता को सस्ते दामों पर तेल उपलब्ध कराना है और दूसरी तरफ देश के अपने किसानों के हितों की रक्षा भी करनी है।
तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई का असर
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग साठ प्रतिशत खाने का तेल मलेशिया, इंडोनेशिया और दूसरे देशों से मंगाता है। दुनिया के किसी भी कोने में अगर मौसम खराब होता है या उत्पादन घटता है, तो उसका सीधा असर भारत के बाजारों में तेल की बोतलों के दामों पर पड़ता है। पिछले कुछ सालों में सूरजमुखी और सोयाबीन के साथ पाम ऑयल के दाम भी आसमान छू चुके हैं। आम परिवारों के लिए रसोई चलाना मुश्किल हो गया है। सरकार की यह नई पाम ऑयल योजना इसी समस्या का स्थायी हल तलाशने के लिए जमीन पर उतारी गई है, ताकि हर साल अरबों रुपए का विदेशी मुद्रा भंडार विदेश न भेजना पड़े।
ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में अभी भी लोग पारंपरिक सरसों या मूंगफली के तेल का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। लेकिन होटलों, रेस्तरां और पैक्ड फूड बनाने वाली बड़ी कंपनियों में पाम ऑयल का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है। यही वजह है कि पाम ऑयल के दाम बढ़ने से हर उस चीज के दाम बढ़ जाते हैं जो पैकेट में बिकती है, जैसे बिस्कुट, नमकीन और साबुन। सरकार चाहती है कि देश में ही इतने कारखाने और मिल लग जाएं जो स्थानीय किसानों से कच्चा माल लेकर यहीं तेल तैयार करें। इससे गांवों में रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे और युवाओं को काम मिलेगा।
भविष्य की रणनीति और जमीनी हकीकत
द फ्रीलान्स की टीम ने जब जमीन पर जाकर किसानों से बात की तो एक अलग ही तस्वीर सामने आई। किसानों का कहना है कि पाम ऑयल का पेड़ तैयार होने में कम से कम चार से पांच साल का समय लगता है। ऐसे में किसान रातों-रात अपनी पारंपरिक धान या गन्ने की खेती छोड़कर पाम ऑयल की तरफ नहीं भाग सकते। उन्हें इस बात की गारंटी चाहिए कि पांच साल बाद भी उनकी फसल का सही दाम मिलेगा या नहीं। कृषि विभाग के अधिकारी किसानों को लगातार समझा रहे हैं कि सरकार ने इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी सुरक्षा योजनाएं भी बनाई हैं ताकि किसानों को घाटा न हो।
आने वाले दिनों में यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना कितनी सफल हो पाती है। क्या भारत सच में पाम ऑयल के मामले में अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा या आयात पर निर्भरता यूं ही बनी रहेगी? इसका जवाब तो आने वाला वक्त ही देगा, लेकिन इतना तय है कि सरकार ने इस दिशा में गंभीर कदम उठा लिया है। आम जनता की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि बाजार में तेल के दाम कब और कितने कम होते हैं, ताकि उनकी रसोई का बजट पटरी पर लौट सके।





