नई दिल्ली से हमारे राजनीतिक ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार इस महीने संसद का एक विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है। सूत्रों से मिल रही पुष्ट जानकारी के मुताबिक, इस संभावित विशेष सत्र का मुख्य एजेंडा लोकसभा सीटों की संख्या में इजाफा करना और नया परिसीमन बिल पास कराना हो सकता है। सरकार चाहती है कि साल 2029 के आम चुनावों से पहले परिसीमन की प्रक्रिया को पूरी तरह से अमलीजामा पहना दिया जाए ताकि समय पर नए नियमों के तहत चुनाव कराए जा सकें।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि इस बड़े विधायी कदम के लिए जरूरी संख्याबल को लेकर सरकार ने अपनी रणनीति पूरी कर ली है। क्षेत्रीय दलों और खासकर द्रमुक यानी डीएमके समेत अन्य छोटे दलों के विरोध को शांत करने के लिए भी पर्दे के पीछे बातचीत चल रही है। महिला आरक्षण कानून को सुचारू रूप से लागू करने के लिए भी परिसीमन का समय पर होना बहुत जरूरी माना जा रहा है। इसी तकनीकी और राजनीतिक मजबूरी के चलते सरकार इस सत्र को बिना किसी देरी के बुलाना चाहती है।
परिसीमन और महिला आरक्षण का सीधा गणित
संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि परिसीमन बिल लाने में अधिक देरी होती है, तो साल 2029 के चुनावों से पहले नए निर्वाचन क्षेत्रों का नक्शा तैयार करना असंभव हो जाएगा। देश में आखिरी बार परिसीमन साल 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था, जिसके बाद से आबादी में भारी बदलाव आ चुका है। दक्षिण भारत के राज्यों और उत्तर भारत के राज्यों की जनसंख्या के अंतर को पाटने के लिए एक नए और संतुलित फॉर्मूले पर काम चल रहा है ताकि किसी भी राज्य के साथ अन्याय न हो।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह दक्षिणी राज्यों के उन सियासी दलों को कैसे मनाए जो जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम करने के कारण सीटों के मामले में नुकसान की आशंका जता रहे हैं। यही वजह है कि बिल को सदन में पेश करने से पहले सभी प्रमुख दलों के साथ आम सहमति बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ खास संशोधनों के जरिए पचास प्रतिशत के दायरे को साधने की योजना भी बनाई गई है ताकि सभी पक्षों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके।
संसद के गलियारों में बढ़ी सियासी हलचल
इस संभावित विशेष सत्र की आहट मिलते ही राजधानी दिल्ली में सियासी सरगर्मी अचानक काफी बढ़ गई है। विभिन्न राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं ने अनौपचारिक बैठकों का दौर शुरू कर दिया है ताकि सदन की रणनीति पर चर्चा की जा सके। विपक्षी दल भी सरकार के इस कदम की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं और यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि बिल के अंदर असल प्रस्ताव क्या रखे गए हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि यदि सरकार इस महीने विशेष सत्र बुलाती है, तो यह संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले का एक बेहद अहम और कड़ा राजनीतिक दांव साबित होगा। आने वाले कुछ दिनों में कैबिनेट की औपचारिक बैठक में इस विशेष सत्र की तारीखों पर मुहर लगने की पूरी उम्मीद है। देश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस बिल में कौन से नए बदलाव पेश करती है और विपक्षी दल इस पर क्या रुख अपनाते हैं।









