नई दिल्ली से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय राजनीति में चाय की प्याली पर होने वाली बैठकों का इतिहास हमेशा से बड़ा दिलचस्प और सत्ता के समीकरण पलटने वाला रहा है। इन दिनों कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी द्वारा आयोजित की जाने वाली हाई-टी पार्टी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक पंडित एक बार फिर साल 1999 के उस भूखे-प्यासे और उठापटक वाले दौर को याद कर रहे हैं, जब केवल एक कप चाय और एक राजनीतिक मुलाकात ने देश की सत्ता का नक्शा पूरी तरह बदल कर रख दिया था। उस समय भी राजनीतिक दलों के बीच मेल-मुलाकात और चाय पर चर्चा के दौर चले थे, जिसके बाद देखते ही देखते अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार संसद में बहुमत साबित करने से चूक गई थी और गिर गई थी।
साल 1999 के उस सियासी घटनाक्रम को याद करें तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी और संसद में कांटे की टक्कर थी। जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बाद वाजपेयी सरकार पहले से ही अल्पमत में आ चुकी थी और हर एक सांसद का वोट सरकार के भविष्य का फैसला करने वाला था। उस नाजुक दौर में दिल्ली के राजनीतिक हलकों में लगातार बैठकों का दौर जारी था और विपक्षी दल एकजुट होकर सरकार को गिराने की जुगत में लगे हुए थे। ऐसे ही कई दौर की गुप्त और खुली बैठकों ने देश की राजनीति में ऐसा भूचाल लाया कि एक वोट के अंतर से तेरह महीने पुरानी सरकार का पतन हो गया। आज जब राहुल गांधी हाई-टी पार्टी की मेजबानी कर रहे हैं, तो पुराने सियासी खिलाड़ी और विश्लेषक उसी इतिहास के पन्नों को पलटकर यह आंकलन करने में जुटे हैं कि मौजूदा राजनीति में इस तरह के मेल-मिलाप क्या नए समीकरण गढ़ सकते हैं।
चाय की टेबल पर कैसे बदल जाते हैं देश के सियासी समीकरण
भारतीय राजनीति की यह पुरानी रीत रही है कि जब भी बड़े सियासी उलटफेर होने होते हैं, तो उसकी पटकथा अक्सर बंद कमरों की बैठकों या फिर अनौपचारिक चाय पार्टियों में लिखी जाती है। साल 1999 में जब वाजपेयी सरकार संकट में थी, तब भी कई विपक्षी नेताओं ने मिलकर रणनीति बनाई थी कि कैसे सरकार को सदन में घेरा जाए और जरूरी आंकड़े जुटाए जाएं। उस समय राष्ट्रीय राजनीति के दिग्गज नेता जैसे लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच लगातार मंथन चल रहा था। सियासत के गलियारों में यह बात आज भी चर्चा का विषय रहती है कि कैसे एक साधारण सी चाय पर हुई चर्चा ने बड़े-बड़े दलों के बीच की दूरियों को मिटा दिया था या फिर नए सियासी समीकरण पैदा किए थे। आज के दौर में जब विपक्ष केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद होने की कोशिश कर रहा है, तो इस तरह की हाई-टी पार्टियों का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बढ़ जाता है।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में राहुल गांधी की यह पहल विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और आपसी तालमेल को बेहतर करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। पिछले कुछ समय से विपक्षी गठबंधन के भीतर कई मुद्दों पर आपसी खींचतान और बयानों के चलते मतभेद सामने आते रहे हैं, जिसे दूर करने के लिए ऐसे अनौपचारिक मिलन बेहद असरदार साबित होते हैं। राजनीति को करीब से देखने वाले जानकारों का मानना है कि औपचारिक बैठकों के बजाय जब नेता चाय या भोजन पर मिलते हैं, तो कई अनसुलझे मुद्दों पर खुलकर बात होती है और दिल के रास्ते दिलों तक पहुंचने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि राहुल गांधी की इस हाई-टी पार्टी को सिर्फ एक सामाजिक मेल-मिलाप नहीं, बल्कि आने वाले दिनों के किसी बड़े राजनीतिक कदम की आहट के रूप में देखा जा रहा है।
वाजपेयी सरकार के पतन का वो ऐतिहासिक और कांटेदार दिन
अगर इतिहास के पन्नों को पीछे पलटकर देखें तो सत्रह अप्रैल 1999 का वो दिन भारतीय लोकतंत्र के सबसे नाटकीय दिनों में गिना जाता है, जब लोकसभा में विश्वास मत पर वोटिंग हुई थी। वाजपेयी सरकार को सदन में अपना बहुमत साबित करना था और दोनों तरफ से सांसदों को अपने पाले में रखने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई थी। संसद भवन के अंदर और बाहर तनाव का माहौल था क्योंकि एक-एक सांसद की मौजूदगी और उसका वोट सरकार की किस्मत तय कर रहा था। आखिरकार जब गिनती पूरी हुई, तो सरकार सिर्फ एक वोट के अंतर से यानी 269 के मुकाबले 270 मतों से गिर गई थी। वह एक वोट किसका था और किन परिस्थितियों में पड़ा था, इस पर आज भी देश की राजनीति में बहस होती है और उसे भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है।
उस दौर में विपक्षी खेमे में भी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर अंदरखाने काफी खींचतान मची हुई थी, जिसके किस्से आज भी सियासी गलियारों में सुनाए जाते हैं। एक दौर ऐसा भी आया था जब समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने की चर्चाएं तेज हो गईं थीं, लेकिन अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों के कड़े विरोध के चलते वह समीकरण परवान नहीं चढ़ सका था। आज जब राहुल गांधी चाय की चुस्कियों के बीच विपक्षी नेताओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं, तो इतिहास की वे तमाम घटनाएं वर्तमान राजनीति के लिए एक बड़ा सबक पेश करती हैं। राजनीति में कब कौन सा दोस्त दुश्मन बन जाए और कब किस चाय की टेबल पर नई सरकार की नींव रख दी जाए, यह कह पाना किसी के लिए भी आसान नहीं होता है और यही भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा रोमांच है।


