नई दिल्ली और रियाद से मिली ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। सऊदी अरब के वली अहद यानी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने यमन के हूती विद्रोहियों से निपटने के लिए अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। इस कड़ी में सऊदी प्रशासन ने अब सीरियाई सरकार से भी मदद की गुहार लगाई है ताकि हूतियों के बढ़ते हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। यमन की सीमा पर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताएं अब चरम पर पहुंच चुकी हैं। इसी बीच, पाकिस्तान की संसद और रक्षा गलियारों से एक चौंकाने वाला कबूलनामा सामने आया है, जिसने क्षेत्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।
पाकिस्तान के आधिकारिक हलकों से यह बात खुलकर सामने आ गई है कि उसकी सेना और एयरफोर्स के जवान सऊदी अरब की धरती पर तैनात हैं। पिछले कई महीनों से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि पाकिस्तानी सैनिक खाड़ी देशों की सुरक्षा में मदद कर रहे हैं, लेकिन अब इस पर आधिकारिक मुहर सी लग गई है। इस्लामाबाद के नीति निर्माताओं का कहना है कि यह तैनाती पुराने रक्षा समझौतों के तहत की गई है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यमन के हूती विद्रोहियों की तरफ से लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद सऊदी अरब को अतिरिक्त सैन्य ताकत की सख्त जरूरत महसूस हो रही थी। पाकिस्तानी सैनिकों की मौजूदगी से रियाद को जमीनी मोर्चे पर बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
सऊदी अरब और सीरिया के बीच कूटनीतिक बदलाव के मायने
मध्य पूर्व के कूटनीतिक इतिहास में यह घटनाक्रम बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। एक समय जो देश सीरिया के खिलाफ खड़े थे, वे आज क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर दमिश्क से मदद मांग रहे हैं। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएस की यह रणनीति साफ इशारा करती है कि हूती विद्रोहियों का खतरा कितना गंभीर रूप ले चुका है। सीरियाई सेना लंबे समय से अपने देश में आंतरिक संघर्ष और बाहरी ताकतों से लड़ती रही है, जिसके पास युद्ध का भारी मैदानी अनुभव है। सऊदी नेतृत्व इसी सैन्य अनुभव का फायदा उठाकर हूतियों की रणनीतिक बढ़त को कमजोर करना चाहता है। दमिश्क और रियाद के बीच के सुधरते रिश्ते आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की पूरी तस्वीर को बदल सकते हैं।
दूसरी ओर, पाकिस्तानी सेना की सऊदी धरती पर मौजूदगी को लेकर घरेलू राजनीति में भी सुगबुगाहट शुरू हो गई है। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है और उसे सऊदी अरब से लगातार आर्थिक मदद और तेल की रियायतें मिलती रही हैं। ऐसे में रियाद की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करना इस्लामाबाद की मजबूरी भी है और कूटनीतिक जरूरत भी। पाकिस्तानी वायुसेना और थल सेना के विशेषज्ञों को संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा और एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। हूती विद्रोही लगातार सऊदी तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते रहे हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ता है।
हूतियों के बढ़ते हमलों से बढ़ी खाड़ी देशों की मुश्किलें
यमन के हूती विद्रोहियों ने पिछले कुछ समय से अपनी सामरिक क्षमता में काफी इजाफा किया है। आधुनिक ड्रोन्स और क्रूज मिसाइलों से लैस ये विद्रोही सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के लिए लगातार सिरदर्द बने हुए हैं। लाल सागर के समुद्री मार्ग पर भी इन विद्रोहियों की वजह से अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यही वजह है कि सऊदी अरब अकेले इस मोर्चे पर लड़ने के बजाय अपने पुराने और नए सहयोगियों को एकजुट करने में जुट गया है। सीरिया से मदद मांगना और पाकिस्तान की सैन्य तैनाती को सार्वजनिक करना इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है ताकि हूतियों पर चौतरफा दबाव बनाया जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की पैनी नजर बनी हुई है। भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए भी यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और वहां काम कर रहे लाखों प्रवासियों पर पड़ता है। द फ्रीलान्स की टीम को मिले इनपुट बताते हैं कि आने वाले हफ्तों में इस मोर्चे पर और भी बड़े सैन्य फेरबदल देखने को मिल सकते हैं। क्या सीरियाई सैनिक सचमुच सऊदी सीमा पर मोर्चा संभालेंगे या यह सिर्फ कूटनीतिक दबाव बनाने की चाल है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है कि मध्य मध्य पूर्व का यह नया समीकरण वैश्विक राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करेगा।




