वॉशिंगटन/मॉस्को — अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने दुनिया भर में हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस युद्ध को बहुत पहले रोका जा सकता था। ट्रंप के अनुसार, जेलेंस्की दुनिया के सबसे बड़े सेल्समैन हैं, जो जब भी अमेरिका आते हैं अरबों डॉलर की मदद लेकर चले जाते हैं। ट्रंप के इस रुख से यूक्रेन के खेमे में गहरी चिंता पैदा हो गई है। वहीं दूसरी तरफ, मास्को से आए एक बयान ने सबको हैरान कर दिया है।
रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन ने ट्रंप की इस टिप्पणी का खुलकर स्वागत किया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि अमेरिका के बड़े नेता अब जमीनी हकीकत को समझने लगे हैं। रूस का कहना है कि यह युद्ध पश्चिमी देशों की गलत नीतियों की वजह से लंबा खिंचा है। अगर जेलेंस्की बातचीत का रास्ता अपनाते, तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती थी। क्रेमलिन का मानना है कि ट्रंप का बयान दिखाता है कि अमेरिकी जनता अब यूक्रेन को बिना सोचे-समझे पैसे देने से थक चुकी है।
ट्रंप ने जेलेंस्की पर क्या लगाए गंभीर आरोप?
एक चुनावी रैली के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने जेलेंस्की पर सीधा हमला बोला था। ट्रंप ने कहा कि जेलेंस्की कभी समझौता नहीं करना चाहते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यूक्रेन के नेतृत्व ने रूस के साथ बातचीत के सभी दरवाजे बंद कर दिए। ट्रंप ने दावा किया कि अगर वे सत्ता में होते, तो यह युद्ध 24 घंटे के अंदर खत्म हो जाता। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका ने यूक्रेन को सैकड़ों अरब डॉलर दिए हैं, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। उनके इस बयान ने पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन नाटो की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
यूक्रेन के समर्थक देशों का मानना है कि ट्रंप की जीत से यूक्रेन की सैन्य मदद रुक सकती है। ट्रंप बार-बार दोहरा रहे हैं कि अमेरिका को अपने देश की समस्याओं पर पैसा खर्च करना चाहिए। उनके अनुसार, दूसरे देशों की जंग में अमेरिकी करदाताओं का पैसा बहाना पूरी तरह गलत है। इस बयान के बाद कीव में जेलेंस्की की सरकार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी दबाव महसूस किया जा रहा है।
रूस ने क्यों तुरंत किया ट्रंप की बात का समर्थन?
रूसी कूटनीतिज्ञों ने ट्रंप के इस बयान को तुरंत लपक लिया। मास्को लंबे समय से यही तर्क देता रहा है कि यूक्रेन बातचीत से भाग रहा है। रूस का कहना है कि 2022 में इस्तांबुल में शांति समझौते का खाका तैयार हो चुका था। लेकिन पश्चिमी देशों के दबाव में जेलेंस्की ने उस समझौते से पैर पीछे खींच लिए थे। अब जब अमेरिका के सबसे बड़े राजनीतिक चेहरों में से एक वही बात कह रहा है, तो रूस इसे अपनी नैतिक जीत मान रहा है।
रूसी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि ट्रंप की बात से साबित होता है कि युद्ध का कारण यूक्रेन की जिद थी। रूस चाहता है कि यूक्रेन अपने कुछ क्षेत्रों को रूसी नियंत्रण में स्वीकार करे और नाटो में शामिल होने की जिद छोड़ दे। ट्रंप के रुख से रूस को उम्मीद बंधी है कि भविष्य में अमेरिका यूक्रेन पर अपनी सख्त शर्तें मानने का दबाव बना सकता है।
यूक्रेन युद्ध के चार साल और बदलता कूटनीतिक रुख
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस युद्ध को चार साल पूरे होने को हैं। इस लंबे संघर्ष में दोनों पक्षों के हजारों सैनिक और नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं। यूक्रेन का बड़ा बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो चुका है। यूरोपीय देश भी इस युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई और ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। आम यूरोपीय नागरिक अब सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर कब तक यूक्रेन को आर्थिक मदद दी जाती रहेगी।
फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देशों के भीतर भी अब युद्ध को बातचीत से खत्म करने की मांग तेज हो रही है। हालांकि नाटो के कई देश अभी भी यूक्रेन को उन्नत हथियार देने के पक्ष में हैं। फ्रांस ने हाल ही में अपने लड़ाकू विमानों की नई तकनीक पेश की है और सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने की बात कही है। इसके बावजूद, अमेरिका की घरेलू राजनीति पूरे मामले का रुख बदलने की ताकत रखती है।
वैश्विक राजनीति और भारत पर इस बयान का असर
यदि ट्रंप सत्ता में वापसी करते हैं और यूक्रेन की मदद रोकते हैं, तो पूरी दुनिया का शक्ति संतुलन बदल जाएगा। भारत शुरू से ही इस विवाद में निष्पक्ष रहा है और बातचीत के जरिए हल निकालने पर जोर देता रहा है। भारत ने रूस के साथ अपने पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखे हैं, जबकि पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत कूटनीतिक रिश्ते साधे हैं। रूस ने हाल ही में भारत के साथ ब्रह्मोस जैसी मिसाइल परियोजनाओं की तरह और भी संयुक्त रक्षा उत्पादन करने की इच्छा जताई है।
अगर अमेरिका और रूस के बीच तनाव थोड़ा भी कम होता है, तो इससे भारत पर से पश्चिमी देशों का दबाव भी घटेगा। ट्रंप और पुतिन के बीच बनते इस नए राजनीतिक समीकरण पर चीन की भी पैनी नजर है। आने वाले महीनों में अमेरिकी चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि यूक्रेन युद्ध शांति समझौते की मेज पर पहुंचेगा या फिर यूरोप में कोई नया मोर्चा खुलेगा।





