नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक विरोध प्रदर्शन ने तूल पकड़ लिया है। इस मामले में दिल्ली पुलिस के एसीपी विवेक भगत की लिखित शिकायत के आधार पर गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है। शिकायत में एक महिला पत्रकार के साथ-साथ 'सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस' (सीजेपी) संगठन के अन्य सदस्यों को भी नामजद किया गया है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानी एससी/एसटी एक्ट की सुसंगत धाराओं का भी जिक्र किया गया है। घटना के बाद से दिल्ली के प्रशासनिक और मानवाधिकार हलकों में हड़कंप मच गया है और मामले की परतें टटोली जा रही हैं।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जंतर-मंतर पर आयोजित इस धरने और प्रदर्शन के दौरान पुलिस अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी। एसीपी विवेक भगत का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान उनके खिलाफ ड्यूटी में बाधा डाली गई और अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने कानून की सख्त धाराओं के तहत मामला दर्ज कर अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया है। इस एफआईआर में अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास जैसे जाने-माने कार्यकर्ताओं व पत्रकारों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जिससे इस मामले का राजनीतिक और सामाजिक दायरा काफी बड़ा हो गया है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ था
जंतर-मंतर देश की राजधानी का वह प्रमुख सार्वजनिक स्थल है जहां विभिन्न मुद्दों को लेकर रोजाना प्रदर्शन और धरने होते रहते हैं। जिस दिन यह घटना घटी, उस दिन एक विशेष मुद्दे पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का एक समूह विरोध दर्ज कराने पहुंचा था। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे एसीपी विवेक भगत और प्रदर्शनकारियों के बीच किसी बात को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई। स्थिति इतनी बिगड़ी कि बात सीधे थाने और कानूनी शिकायतों तक जा पहुंची। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पुलिस बल और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई इस झड़प का वीडियो फुटेज भी अब पुलिस जांच का अहम हिस्सा बन चुका है।
एसीपी विवेक भगत ने अपनी शिकायत में विशेष तौर पर जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल और सरकारी काम में बाधा डालने का गंभीर आरोप लगाया है। इसी आरोप के आधार पर पुलिस ने एफआईआर में एससी/एसटी एक्ट की धाराओं को भी शामिल किया है। देश के कानून के मुताबिक एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामले बेहद गंभीर माने जाते हैं और इनमें गिरफ्तारी से लेकर आगे की कानूनी प्रक्रिया तक के नियम काफी कड़े होते हैं। पुलिस के इस कदम के बाद से उन सभी लोगों की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं जिनके नाम इस शिकायत में दर्ज किए गए हैं।
सीजेपी सदस्यों और पत्रकारों की कानूनी मुश्किलें
इस एफआईआर के बाद सीजेपी यानी सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस संगठन और उससे जुड़े लोगों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास जैसे नाम सामने आने के बाद विभिन्न नागरिक संगठनों ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि प्रेस की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लोकतांत्रिक अधिकार के तहत वे लोग वहां मौजूद थे। दूसरी ओर, पुलिस विभाग अपने अधिकारियों की गरिमा और कानूनी कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कह रहा है।
इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल से यह साफ होता है कि पुलिस और मीडिया या कार्यकर्ताओं के बीच का यह टकराव अब एक बड़े कानूनी विवाद का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में इस मामले में गिरफ्तारियों या अग्रिम जमानत की अर्जियों का दौर देखने को मिल सकता है। अदालत में इस बात पर भी कानूनी बहस होगी कि क्या विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए बयानों और की गई हरकतों पर एससी/एसटी एक्ट की धाराएं टिकती हैं या नहीं।
जांच का दायरा और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में किसी भी पक्ष के साथ कोई पक्षपात नहीं किया जाएगा। कानून के जानकारों का मानना है कि चूंकि मामला एक एसीपी स्तर के अधिकारी की शिकायत पर दर्ज हुआ है, इसलिए पुलिस महकमा इसे काफी गंभीरता से ले रहा है। वीडियो साक्ष्यों और मौके पर मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों के बयानों को दर्ज करने का काम तेजी से चल रहा है।
द फ्रीलान्स की टीम इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे-जैसे जांच में नए तथ्य सामने आएंगे, हम अपने पाठकों तक सबसे पहले और सटीक जानकारी पहुंचाते रहेंगे। फिलहाल जंतर-मंतर के इस चर्चित विवाद ने एक बार फिर से राजधानी में पुलिस बल के अधिकारों और नागरिकों के प्रदर्शन करने के अधिकारों के बीच की महीन रेखा पर बड़ी बहस छेड़ दी है।






