नई दिल्ली के सियासी गलियारों और सड़कों पर अक्सर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की आम बात है। लेकिन इन सबके बीच उन खाकी वर्दी वालों का दर्द छिप जाता है जो अपनी जान जोखिम में डालकर कानून व्यवस्था संभालते हैं। हाल ही में हुए एक बड़े विपक्षी प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस का एक जवान गंभीर रूप से घायल हो गया। प्रदर्शनकारियों को रोकने की जद्दोजहद में उसे कई जगह चोटें आईं और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उस सिपाही का दर्द सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका मानसिक और भावनात्मक संबल भी पूरी तरह हिल चुका था।
घटना के तुरंत बाद जब उसकी पत्नी का फोन उसके मोबाइल पर आया, तो उस सिपाही के सब्र का बांध टूट गया। उसने मीडिया से बात करते हुए बताया कि जब घर से फोन आया और पत्नी ने रोते हुए उसकी सलामती पूछी, तो उसे लगा कि वह अपने परिवार को किस हाल में छोड़ आया है। पत्नी के पूछने पर कि वहां क्या हुआ, जवान के पास कोई ऐसा जवाब नहीं था जो उसे दिलासा दे सके। उसने नम आंखों से कहा कि ड्यूटी के दौरान लगने वाली शारीरिक चोटें तो वक्त के साथ ठीक हो जाती हैं, लेकिन जब भीड़ के सामने बेबस होना पड़ता है, तब सेल्फ रेस्पेक्ट यानी आत्मसम्मान को सबसे बड़ी ठेस पहुंचती है।
जब खाकी वर्दी पर आते हैं सवाल
राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनों को संभालना किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं होता है। एक तरफ उग्र भीड़ और राजनीतिक नारेबाजी होती है, तो दूसरी तरफ सरकार के आदेशों का पालन कराने की मजबूरी होती है। घायल जवान ने बताया कि जब भीड़ चारों तरफ से घेर लेती है और वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश पर उन्हें आगे डटे रहना पड़ता है, तब कई बार हालात नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं। उस वक्त जनता या नेताओं की तरफ से मिलने वाली खरी-खोटी बातें और धक्के सीधे दिल पर लगते हैं। सिपाही ने दर्द बयां करते हुए कहा कि हम भी किसी के बेटे, किसी के पति और किसी के पिता हैं, लेकिन वर्दी पहनते ही हमारी अपनी कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं रह जाती है।
इस पूरी घटना ने पुलिस महकमे के भीतर काम करने वाले आम सिपाहियों की मानसिक स्थिति और उनकी कामकाजी परिस्थितियों पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बड़े अधिकारी सिर्फ आंकड़े देखते हैं कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा या उग्र, लेकिन एक सिपाही के जूते घिस जाते हैं, उसकी हड्डियां चटक जाती हैं और उसका परिवार हर पल डर के साये में जीता है। जवान की पत्नी का वो फोन कॉल इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि कैसे वर्दी पहने एक शख्स की जंग सिर्फ बाहर नहीं, बल्कि अपने घर और समाज के सामने भी चल रही होती है, जहां उसे अपनी नौकरी और सम्मान के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
ड्यूटी और परिवार के बीच पिसता सिपाही
अस्पताल में इलाज करा रहे इस सिपाही की यह कहानी अकेली नहीं है। दिल्ली पुलिस के हजारों जवान रोजाना इस प्रकार के तनावपूर्ण माहौल में अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं। न तो उनके काम के घंटे तय होते हैं और न ही त्योहारों पर उन्हें छुट्टी मिलती है। ऊपर से राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान जब हिंसा भड़कती है, तो निशाना सबसे पहले इन्हीं सुरक्षाकर्मियों को बनाया जाता है। जनता के गुस्से का शिकार होने वाले ये जवान बिना किसी व्यक्तिगत द्वेष के सिर्फ अपनी नौकरी निभा रहे होते हैं। जब ऐसी घटनाओं में उन्हें चोटें लगती हैं, तो उनके परिवारों की नींद उड़ जाती है।
सिपाही ने अंत में यही कहा कि वह अपनी ड्यूटी से कभी पीछे नहीं हटेगा, क्योंकि यह उसकी देश और विभाग के प्रति निष्ठा है। लेकिन उसने यह भी अपील की कि कम से कम आम जनता और राजनीतिक दलों को भी यह समझना चाहिए कि पुलिसकर्मी भी इंसान हैं। उनके भीतर भी भावनाएं होती हैं और उनका भी एक परिवार होता है जो घर पर उनके सुरक्षित लौटने का इंतजार करता है। घायल जवान की यह आपबीती आज हर उस शख्स को सोचने पर मजबूर करती है जो सड़क पर व्यवस्था बनाए रखने वाले इन खाकीधारी योद्धाओं की इज्जत करना भूल जाता है।







