नई दिल्ली और चेन्नई — तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों बयानों के तीर खूब चल रहे हैं। राज्य की सत्ताधारी पार्टी डीएमके ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को सीधे निशाने पर लिया है। डीएमके नेताओं ने राहुल गांधी को खरी-खरी सुनाई है और तीखे सवाल दागे हैं। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर कुछ और और राज्यों में कुछ और नीतियां अपनाना सही नहीं है। इस बयानबाजी के बाद से देश की सियासत में हलचल तेज हो गई है और राजनीतिक दलों के बीच नए समीकरणों पर चर्चा शुरू हो गई है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में एसआईआर का मुद्दा और उससे जुड़े दोहरे मापदंड का आरोप है। डीएमके का मानना है कि इस मामले में कांग्रेस का रुख साफ नहीं है। पार्टी ने खुलकर कहा है कि जनता के सामने हर बात स्पष्ट होनी चाहिए। एक तरफ कांग्रेस गठबंधन धर्म निभाने की बात करती है, तो दूसरी तरफ कई मुद्दों पर आपसी खींचतान खुलकर सामने आ जाती है। हमारे फील्ड रिपोर्टरों ने जब चेन्नई के राजनीतिक गलियारों में पड़ताल की, तो पता चला कि यह नाराजगी पिछले कुछ दिनों से अंदर ही अंदर सुलग रही थी जो अब खुलकर बाहर आ गई है।
तमिलनाडु में भाषा नीति और मुआवजे पर भी उबाल
तमिलनाडु की राजनीति सिर्फ राहुल गांधी और एसआईआर तक सीमित नहीं है। राज्य में इन दिनों कई अन्य स्थानीय मुद्दे भी बहुत तेजी से गरमा रहे हैं। हाल ही में डीएमके ने थलपति विजय पर गुपचुप तरीके से तीन भाषा नीति लागू करने का बड़ा आरोप लगाया है। इसके अलावा, दवाओं के हिंदी प्रिंट कवर को लेकर भी सियासत काफी गर्म हो गई है। विपक्षी दल और क्षेत्रीय संगठन इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि राज्य में कौन सी भाषा और संस्कृति नीति चुपचाप थोपी जा रही है। आम जनता के बीच भी इन मुद्दों पर खासी चर्चा हो रही है और लोग अपनी राय खुलकर रख रहे हैं।
दूसरी तरफ, राज्य के ग्रामीण इलाकों से किसानों की बदहाली की तस्वीरें भी सामने आई हैं। हाल ही में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया जहां किसानों को मुआवजे के तौर पर मात्र पांच और दस रुपये के चेक दिए गए। इतनी कम राशि का मुआवजा मिलने से किसानों में भारी गुस्सा है। किसानों का कहना है कि सरकार उनके साथ मजाक कर रही है। जब सूखा या बाढ़ जैसी आपदा आती है, तो किसानों को पर्याप्त मदद नहीं मिलती। इस प्रशासनिक लापरवाही ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं और विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है.
जयललिता स्मारक और सामाजिक न्याय की नई इबारत
एक तरफ जहां राजनीतिक टकराव और विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य में कुछ नए प्रशासनिक और सामाजिक कदम भी उठाए गए हैं। मुख्यमंत्री ने हाल ही में दिवंगत नेता जयललिता के लिए बनाए जा रहे भव्य स्मारक मंडपम का शिलान्यास किया है। इस कदम को राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि तमिलनाडु की सियासत में जयललिता का नाम आज भी बहुत बड़ा प्रभाव रखता है। सभी राजनीतिक दल उनके समर्थकों को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटे रहते हैं ताकि चुनावी लाभ मिल सके।
इन सबके बीच, तमिलनाडु से एक बेहद सकारात्मक और प्रेरणादायक खबर भी सामने आई है। सत्य श्री शर्मिला ने भारत की पहली ट्रांसजेंडर वकील बनकर इतिहास रच दिया है। उनकी इस ऐतिहासिक सफलता से पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई है। तमाम संघर्षों और सामाजिक बाधाओं को पार करके उन्होंने यह मुकाम हासिल किया है। द फ्रीलान्स की टीम ने पाया कि जहां एक तरफ राजनीतिक बयानबाजी और विवादों का दौर जारी है, वहीं दूसरी तरफ आम लोग और असाधारण प्रतिभाएं अपनी मेहनत से समाज की तस्वीर बदलने का काम कर रही हैं।





