नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के अन्नदाताओं के लिए आज का दिन बेहद खास रहा है। प्रधानमंत्री ने कृषि बुनियादी ढांचा कोष के तहत पूरे एक लाख करोड़ रुपये के बड़े कृषि कर्ज फंड की शुरुआत की है। इस फंड का मुख्य मकसद गांवों में खेती से जुड़े गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और फसल कटाई के बाद काम आने वाले आधुनिक उपकरण तैयार करना है। लंबे समय से देश के किसान यह मांग कर रहे थे कि उन्हें फसल स्टोर करने के लिए बेहतर साधन मिलें ताकि औने-पौने दामों में अपनी उपज न बेचनी पड़े। सरकार के इस बड़े कदम से अब गांवों में ही पक्के गोदाम बन सकेंगे और किसानों को अपनी फसल रखने की सुरक्षित जगह मिल जाएगी।
इस बीच देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों से जुड़ी कई बड़ी और अहम खबरें सामने आ रही हैं। पश्चिम बंगाल में कृषक बंधु योजना की नई सूची को लेकर गांवों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग इंटरनेट कैफे और पंचायत दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं ताकि यह जांच सकें कि उनका नाम नई सूची में आया है या नहीं। इस योजना के जरिए पात्र किसानों को हर साल आर्थिक सहायता मिलती है जिससे छोटे किसानों को खेती की शुरुआती लागत जुटाने में बहुत मदद मिलती है। अधिकारी इन सूचियों को अपडेट करने में जुटे हैं ताकि किसी भी जरूरतमंद परिवार का नाम पीछे न छूटे।
पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण तक किसान सम्मान के कार्यक्रम
असम के दुधनै इलाके में हाल ही में विशेष रूप से किसान सम्मान दिवस का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों और स्थानीय अधिकारियों ने किसानों के साथ सीधे संवाद किया। वैज्ञानिकों ने किसानों को कम लागत में ज्यादा पैदावार लेने के आधुनिक और आसान तरीके बताए। इस दौरान उन किसानों को विशेष रूप से सम्मानित किया गया जिन्होंने प्राकृतिक खेती या जैविक खाद का इस्तेमाल करके बेहतरीन फसल उगाई है। ऐसे आयोजनों से गांवों के युवाओं का रुझान भी फिर से खेती की तरफ बढ़ रहा है और वे पारंपरिक तरीकों के साथ नई तकनीक अपना रहे हैं।
दूसरी ओर, खेती-किसानी के मोर्चे पर सुरक्षा और सीमाओं से जुड़े हालात भी लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में किसानों की जमीन और सरहद पर होने वाली गतिविधियों का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सीमावर्ती इलाकों के किसान अक्सर सुरक्षा पाबंदियों और अन्य प्रशासनिक नियमों के बीच अपनी खेती का काम संभालते हैं। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बल आपसी तालमेल के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि किसानों को अपने खेतों तक आने-जाने में कोई बड़ी परेशानी न उठानी पड़े।
एक लाख करोड़ के इस फंड से गांवों में कैसे पहुंचेगा पैसा?
बड़ा सवाल यह है कि सरकार की इस एक लाख करोड़ रुपये की योजना का फायदा गांव के साधारण किसान तक आखिर कैसे पहुंचेगा। नियमों के मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल बैंक और सहकारी समितियां किसानों और ग्रामीण उद्यमियों को बहुत कम ब्याज दर पर कर्ज देने के लिए करेंगी। जो लोग गांव में कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट या छंटाई केंद्र खोलना चाहते हैं, वे इस योजना के तहत आसानी से लोन ले सकेंगे। सरकार का मानना है कि जब गांव में ही फसल को सुरक्षित रखने और पैक करने के साधन बन जाएंगे, तो किसानों की आमदनी अपने आप बढ़ जाएगी।
जमीनी स्तर पर हमारे संवाददाताओं ने जब ग्रामीण बैंकों और पैक्स समितियों का जायजा लिया, तो पता चला कि बैंक अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे किसानों के कागजात की प्रक्रिया को सरल बनाएं। बहुत से छोटे किसानों का कहना है कि अगर कागजी कार्रवाई कम होगी, तो उन्हें समय पर पैसा मिल पाएगा। हालांकि अभी इस बात पर भी नजर रखी जा रही है कि बड़े व्यापारी इस फंड का गलत फायदा न उठाएं और सारा पैसा असल में उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और किसानों की उम्मीदें
देशभर में चल रही इन तमाम योजनाओं और आयोजनों के बीच किसानों की उम्मीदें एक बार फिर जाग उठी हैं। चाहे वह एक लाख करोड़ का नया बुनियादी ढांचा फंड हो या फिर राज्यों की कल्याणकारी सूचियां, हर कदम का सीधा असर आम किसान की जेब पर पड़ता है। द फ्रीलान्स की टीम आने वाले दिनों में यह भी जमीन पर जाकर देखेगी कि गोदामों के निर्माण और लोन वितरण का यह काम कागजों से निकलकर असल में धरातल पर कितना असर दिखा रहा है। किसानों का यही कहना है कि योजनाओं की घोषणाएं अच्छी हैं, बस उनका समय पर और सही लोगों तक पहुंचना सबसे ज्यादा जरूरी है।




