नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — बीते चौबीस घंटों के भीतर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में धरती के अचानक कांपने से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। भारत के पहाड़ी राज्य उत्तराखंड से लेकर पड़ोसी देश तिब्बत और दूरदराज के देशों जैसे तुर्किए और कोलम्बिया तक भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए हैं। रिक्टर स्केल पर इन सभी झटकों की तीव्रता मध्यम से लेकर तेज श्रेणी के बीच दर्ज की गई है। वैज्ञानिक और भूगर्भ विशेषज्ञ इन घटनाओं पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि अचानक इतनी जगहों पर जमीन के भीतर हलचल क्यों तेज हो गई है।
हमारे ग्राउंड संवाददाताओं और अंतरराष्ट्रीय मीडिया से मिले आंकड़ों के अनुसार, भारत के उत्तराखंड क्षेत्र में रिक्टर पैमाने पर पांच दशमलव एक तीव्रता का भूकंप मापा गया। इस झटके के प्रभाव पड़ोसी देश नेपाल के सुदूरपश्चिम इलाकों तक साफ महसूस किए गए, जिससे ग्रामीण इलाकों में लोग अपने घरों और दुकानों से बाहर सुरक्षित खुले मैदानों में भाग खड़े हुए। गनीमत यह रही कि शुरुआती घंटों में किसी बड़े जानमाल के नुकसान की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने सभी पहाड़ी जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया है ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
तिब्बत और तुर्किए में बार-बार डोल रही है धरती
केवल भारत के पड़ोसी इलाकों तक ही यह सिलसिला सीमित नहीं रहा, बल्कि तिब्बत की धरती पर भी एक बार फिर भूकंप के झटकों ने लोगों को डरा दिया। तिब्बत में आए इस नए भूकंप की तीव्रता ने स्थानीय नागरिकों और मौसम विभाग की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र में लगातार जमीन हिलने की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं। इसके अलावा, पश्चिमी एशिया के देश तुर्किए में भी पांच दशमलव आठ तीव्रता का एक बड़ा भूकंप आया जिसका केंद्र जमीन से महज दस किलोमीटर की गहराई में था। इतनी कम गहराई पर केंद्र होने के कारण तुर्किए के कई शहरों में धरती बहुत तेज गति से हिली, जिससे घबराए हुए लोग आधी रात को ही सड़कों पर आ गए और ठिठुरती ठंड के बीच खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हुए।
तुर्किए के स्थानीय अस्पतालों और आपातकालीन सेवाओं को तुरंत प्रभाव से अलर्ट मोड पर डाल दिया गया है ताकि घायलों या सदमे में आए लोगों को तुरंत चिकित्सीय सहायता मुहैया कराई जा सके। हालांकि प्रशासन ने तुरंत बचाव दल प्रभावित बस्तियों में भेज दिए थे, लेकिन कम गहराई के कारण आए इस झटके ने लोगों के दिलों में पिछले साल की बड़ी प्राकृतिक आपदाओं की डरावनी यादें ताजा कर दी हैं। लोग अभी भी अपने घरों के भीतर जाने से कतरा रहे हैं और प्रशासन लगातार लाउडस्पीकर के जरिए लोगों से अपील कर रहा है कि वे क्षतिग्रस्त इमारतों के आसपास बिल्कुल न जाएं।
कोलम्बिया में बारह लाख लोगों को राहत सामग्री की सख्त जरूरत
दूसरी तरफ, लातिन अमेरिकी देश कोलम्बिया में भी आए भीषण भूकंप के बाद हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र और राहत एजेंसियों से मिली ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कोलम्बिया के प्रभावित इलाकों में करीब बारह लाख ऐसे लोग हैं जिन्हें इस समय तत्काल मानवीय सहायता और भोजन-पानी की सख्त जरूरत है। कई दूरदराज के पहाड़ी और ग्रामीण समुदाय भूस्खलन के कारण मुख्य सड़कों से कट चुके हैं, जिससे राहत दल अभी तक पूरी तरह से उन तक नहीं पहुंच पाए हैं। सेना के हेलिकॉप्टरों की मदद से उन इलाकों में खाने के पैकेट और दवाइयां गिराई जा रही हैं, लेकिन लगातार हो रही बारिश के कारण राहत कार्यों में भारी रुकावट आ रही है।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे हमारे रिपोर्टर्स का कहना है कि प्रभावित गांवों में बिजली और पानी की लाइनें पूरी तरह ठप हो चुकी हैं, जिससे आम जनता को रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों के लिए भी भारी संघर्ष करना पड़ रहा है। स्थानीय लोग अपने टूटे हुए आशियानों को खुद ही ठीक करने में जुटे हैं और सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं। आपदा प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दो-तीन दिनों तक राहत और बचाव अभियान पूरी गति से जारी रहेगा ताकि हर एक जरूरतमंद व्यक्ति तक आवश्यक सामग्री पहुंचाई जा सके।
भूकंपीय जोन में लगातार हलचल से वैज्ञानिक भी हैरान
भूगर्भ विशेषज्ञों का कहना है कि पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों में लगातार होने वाली आंतरिक उठापटक की वजह से इन सभी अलग-अलग देशों में लगभग एक ही समय के आसपास ऐसी घटनाएं देखने को मिल रही हैं। भारत का उत्तराखंड और तिब्बत का पूरा क्षेत्र हिमालयी भूकंपीय पट्टी के अंतर्गत आता है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से दुनिया के सबसे संवेदनशील और सक्रिय जोन माने जाते हैं। यहां जरा सी भी प्लेटों की खिसकन बड़े भूकम्पों का रूप ले लेती है, इसलिए स्थानीय निर्माण कार्यों और मकानों को भूकंपरोधी तकनीक से बनाना अब बेहद जरूरी हो गया है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन समय रहते पुख्ता तैयारियां करके इनसे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है। सरकार और आम नागरिकों दोनों को ही अब इन चेतावनियों को गंभीरता से लेना होगा और आपदा से निपटने के लिए हर समय तैयार रहना होगा। हमारे रिपोर्टर्स देश और दुनिया के इन हिस्सों से पल-पल की सटीक और सच्ची खबरें आप तक आगे भी पहुंचाते रहेंगे।





