चेन्नई से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु में इन दिनों चावल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। बाजार में खाने वाले चावल के दाम इतने ज्यादा हो गए हैं कि आम आदमी की थाली से दाल-चावल दूर होने लगा है। महंगाई के इस दौर में रोज कमाने खाने वाले परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल होता जा रहा है। स्थानीय बाजारों में लोग बढ़े हुए दामों को लेकर खुलकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि सरकार को इस मामले में तुरंत दखल देना चाहिए ताकि गरीबों को राहत मिल सके।
बढ़ती कीमतों के इस मामले पर अब सियासी पारा भी गर्मा गया है। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्षी दलों ने सरकार को इस मुद्दे पर घेरा और तीखे सवाल पूछे। सदन में चर्चा के दौरान मंत्री वेंकटरमनान ने चावल के दाम बढ़ने के पीछे की असली वजहों का ब्योरा दिया। सरकार का कहना है कि मौसम की मार और उत्पादन में कमी की वजह से बाजार में कीमतें प्रभावित हुई हैं। हालांकि, सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया है कि आम जनता को सस्ती दरों पर अनाज मुहैया कराने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं ताकि बाजार पर लगाम कस सके।
मदुरै में राशन के चावल के दुरुपयोग पर बड़ा एक्शन
एक तरफ जहां बाजार में खुले चावल के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राशन के चावल की कालाबाजारी और गलत इस्तेमाल के मामले भी सामने आ रहे हैं। मदुरै जिले में प्रशासन ने एक कड़ा आदेश जारी किया है। अधिकारियों ने हाल ही में बांटे गए चावल के नमूनों को लैब में जांच के लिए भेजने का हुक्म दिया है। आरोप है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के तहत मिलने वाला मुफ्त या सस्ता राशन का चावल एक राजनीतिक दल के कल्याणकारी कार्यक्रम में बांट दिया गया था।
मदुरै में सामने आए इस मामले के बाद से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक स्थानीय कार्यक्रम में करीब एक हजार लाभार्थियों को पांच-पांच किलो चावल के पैकेट बांटे गए थे। स्थानीय लोगों और विपक्षी दलों ने जब सवाल उठाया कि गरीबों का राशन निजी कार्यक्रमों में कैसे पहुंच गया, तब जिला प्रशासन हरकत में आया। अधिकारियों का कहना है कि चावल के नमूनों की जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी ताकि भविष्य में ऐसी गड़बड़ी दोबारा न हो सके।
पारंपरिक खानपान और गोल्डेन राइस पर छिड़ी ग्लोबल बहस
महंगाई और प्रशासनिक गड़बड़ियों के बीच तमिलनाडु की संस्कृति में चावल का महत्व आज भी उतना ही गहरा है। सोशल मीडिया और यूट्यूब पर पारंपरिक व्यंजनों का क्रेज लगातार बढ़ रहा है। लोग पारंपरिक रूप से बनाए जाने वाले कोइवत स्पेशल 'अरिसी ' यानी चावल और दाल की खास रेसिपी को बहुत पसंद कर रहे हैं। इस तरह के वीडियो इंटरनेट पर खूब देखे जा रहे हैं जो यह बताते हैं कि दक्षिण भारत के खानपान में चावल की कितनी अहम जगह है, चाहे महंगाई कितनी भी क्यों न बढ़ जाए।
दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चावल की एक खास किस्म 'गोल्डेन राइस' को लेकर भी तीखी बहस छिड़ी हुई है। द स्पेक्टेटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण संगठन ग्रीनपीस के विरोध और activism की वजह से गोल्डेन राइस के प्रसार में रुकावट आ रही है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के चावल बच्चों में कुपोषण और विटामिन की कमी दूर करने में मददगार हो सकते थे, लेकिन विवादों के कारण इनकी पहुंच जरूरतमंद बच्चों तक नहीं हो पा रही है। कुल मिलाकर चावल का यह पूरा मुद्दा अब राजनीति, पोषण और महंगाई के इर्द-गिर्द घूम रहा है।


