नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारत में भूजल यानी जमीन के नीचे का पानी अब एक गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ा है। हाल ही में सामने आई जमीनी रिपोर्ट बताती हैं कि एक तरफ जहां पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उद्योगों का कचरा और प्रशासनिक लापरवाही साफ पानी के बचे-खुचे स्रोतों को भी जहरीला बना रही है। आम आदमी को पीने के लिए शुद्ध पानी मिलना मुश्किल होता जा रहा है और ग्रामीण इलाकों में हालात सबसे ज्यादा डरावने होते जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों और दावों के इतर, गांवों और छोटे शहरों की हकीकत बेहद चिंताजनक है जहां लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में स्थिति सबसे अधिक भयावह रूप ले चुकी है। यहां फैक्ट्रियों के पास रहने वाले ग्रामीण भूजल संकट के बीच जीने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, जमीन से निकलने वाला पानी अब पीला पड़ चुका है और उसमें से तेज तेजाब जैसी गंध आती है। इस जहरीले पानी के इस्तेमाल से खेत में खड़ी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो रही हैं। सबसे दुखद बात यह है कि इस प्रदूषित पानी के संपर्क में आने से ग्रामीणों को आंखों में जलन और गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्रवाई अभी तक नदारद है।
आज़मगढ़ में इतिहास दफना रहे कुएं और लापरवाही
अलीगढ़ की तरह ही आज़मगढ़ से भी भूजल को लेकर आंखें खोल देने वाली रिपोर्ट सामने आई है। यहां जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोत रहे प्राचीन कुएं अब अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। लापरवाही की हद यह है कि जिले में दो सौ से अधिक पुराने कुएं आज कूड़ाघर में तब्दील हो चुके हैं। स्थानीय प्रशासन और लोगों की अनदेखी के चलते जिन कुओं से कभी मीठा और ठंडा भूजल निकलता था, वे अब प्लास्टिक और कचरे से पटे पड़े हैं। इन ऐतिहासिक जल स्रोतों के नष्ट होने से न केवल भूजल का रीचार्ज होना बंद हो गया है, बल्कि आसपास का भूजल स्तर भी तेजी से नीचे खिसक गया है।
एक तरफ जहां लापरवाही के किस्से आम हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ जगहों पर सकारात्मक पहल की उम्मीद भी जगी है। गाजियाबाद जिले में कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के तहत एक निजी कंपनी ने आगे आकर दस पुराने कुओं को संवारने का बीड़ा उठाया है। इस 'अमृत कूप' अभियान के तहत पुराने कुओं की सफाई करके उन्हें फिर से जीवित किया जा रहा है ताकि बारिश का पानी सीधे जमीन के भीतर जा सके। इसी तरह, ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण अभियानों के तहत मिट्टी के बांध और छोटे गड्ढे बनाए जा रहे हैं ताकि बहता हुआ बारिश का पानी रोका जा सके और जमीन की प्यास बुझाई जा सके।
कब्रिस्तानों और ग्रामीण क्षेत्रों में जल संचयन की अनूठी पहल
जल संकट से निपटने के लिए अब ग्रामीण खुद अपने स्तर पर आगे आ रहे हैं। कैराना के एक स्थानीय कब्रिस्तान में पानी को सीधे जमीन के अंदर पहुंचाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया गया है। ग्राम प्रधान के नेतृत्व में वहां बड़े-बड़े नीले गड्ढे खोदे जा रहे हैं ताकि बारिश का पानी बेकार बहकर न जाए और सीधे भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करे। ऐसे ही प्रयास बसेला और कुलहैंडा जैसे गांवों में भी देखने को मिले हैं, जहां विशेष योजनाओं के तहत छोटे बंधी और अवरोधक बनाए जा रहे हैं ताकि पानी जमीन में समा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जनभागीदारी के साथ सख्त औद्योगिक कानून लागू नहीं होंगे, तब तक भूजल संकट का कोई स्थाई हल नहीं निकल सकता। फैक्ट्रियों द्वारा जमीन में सीधे रासायनिक अपशिष्ट भेजना एक कानूनी अपराध है, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी कमजोर होने के कारण ये गतिविधियां धड़ल्ले से जारी हैं। यदि समय रहते भूजल दोहन और उसके प्रदूषण पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाले कुछ सालों में भारत के कई हिस्से पूरी तरह जलहीन रेगिस्तान में बदल सकते हैं।
जल बचाने की राह में चुनौतियां और आगे की जरूरतें
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ है कि देश में पानी की कमी अब केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव जनित संकट बन चुकी है। एक तरफ कॉर्पोरेट घराने और ग्रामीण अपने स्तर पर कुएं संवार रहे हैं और जल संरक्षण के गड्ढे बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ फैक्ट्रियों का जहर हमारे जल स्रोतों को खोखला कर रहा है। जरूरत इस बात की है कि सरकार केवल कागजी योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि अवैध रूप से भूजल खींचने वालों और पानी में जहर घोलने वाली फैक्ट्रियों पर भारी जुर्माना लगाए। आम नागरिकों को भी यह समझना होगा कि पानी का हर एक बूंद कीमती है और यदि आज इसे नहीं बचाया गया, तो कल का भविष्य बहुत अंधकारमय होगा।




