नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले तीन दशकों से अधिक समय से चल रहा धरना-प्रदर्शनों का दौर अब खत्म होने जा रहा है। प्रशासनिक आदेश के मुताबिक, अब जंतर-मंतर को आधिकारिक तौर पर प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। यह फैसला शहर में बढ़ती ट्रैफिक समस्याओं और आम नागरिकों की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। पिछले 33 सालों में यहां हजारों छोटे-बड़े आंदोलन, राजनीतिक धरने और श्रमिक संगठनों के प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें कई ऐतिहासिक पल भी गवाह बने हैं।
प्रशासन की ओर से जंतर-मंतर के विकल्प के तौर पर राजधानी के अन्य हिस्सों में तीन नए स्थान तय किए गए हैं। इन नए स्थलों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और प्रदर्शनकारियों के लिए बुनियादी सुविधाएं भी जुटाई जा रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि शहर के मुख्य इलाकों में ट्रैफिक जाम की समस्या को कम करने के लिए यह कदम बेहद जरूरी था। हालांकि, पुराने राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि जंतर-मंतर की एक अलग पहचान थी और इस बदलाव से आंदोलनों की पहुंच पर असर पड़ सकता है।
जंतर-मंतर की जगह अब कहां होंगे धरने और प्रदर्शन?
प्रशासन द्वारा तय किए गए तीन नए स्थानों को लेकर शहरभर में चर्चा तेज हो गई है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में किसी भी राजनीतिक दल, संघ या संगठन को जंतर-मंतर पर जुटने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके बजाय उन्हें प्रशासन द्वारा निर्धारित नए वैकल्पिक परिसरों का ही उपयोग करना होगा। इन नए स्थलों पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने विशेष दिशा-निर्देश तैयार किए हैं ताकि कानून व्यवस्था पूरी तरह से नियंत्रण में बनी रहे।
स्थानीय व्यापार मंडलों और आम नागरिकों ने प्रशासन के इस कदम का स्वागत किया है। उनका तर्क है कि जंतर-मंतर पर होने वाले लगातार प्रदर्शनों के कारण आसपास की सड़कों पर लंबा जाम लग जाता था जिससे आम लोगों का रोजाना का सफर मुश्किल हो जाता था। दूसरी ओर, विभिन्न सामाजिक संगठनों का कहना है कि नए स्थान शहर के मुख्य केंद्रों से दूर हैं, जिससे मीडिया और आम जनता तक अपनी बात पहुंचाना थोड़ा कठिन हो जाएगा।
33 साल पुराना इतिहास और आंदोलनों का सफर
जंतर-मंतर का इतिहास भारत के लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। नब्बे के दशक की शुरुआत से ही यह जगह देशभर के असंतुष्ट समूहों, किसानों, बेरोजगार युवाओं और कर्मचारियों की आवाज उठाने का प्रमुख मंच रही है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहां कई बड़े और ऐतिहासिक धरने लंबे समय तक चले हैं, जिन्होंने देश की राजनीति और नीतियों को प्रभावित किया है। इस जगह ने देश के कई बड़े राजनीतिक बदलावों और जन-आंदोलनों को अपनी आंखों से देखा है।
अब इस तीन दशक पुराने अध्याय के बंद होने के बाद देश की राजधानी में विरोध प्रदर्शनों की संस्कृति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। प्रशासन का यह भी कहना है कि लोकतंत्र में विरोध जताने का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके साथ ही शहर की व्यवस्था और आम जनता की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये नए तीन स्थान विरोध प्रदर्शनों के नए केंद्र के रूप में कितने कारगर साबित होते हैं।
प्रशासन की नई गाइडलाइंस और सुरक्षा व्यवस्था
नए प्रदर्शन स्थलों के चयन के साथ ही प्रशासन ने कुछ सख्त नियम भी लागू किए हैं। किसी भी संगठन को प्रदर्शन करने से पहले स्थानीय पुलिस से लिखित अनुमति लेनी होगी और तय सीमा से अधिक समय तक रुकने की इजाजत नहीं होगी। ध्वनि प्रदूषण और यातायात को बाधित करने वाले आयोजनों पर कड़ी नजर रखी जाएगी। सुरक्षा बलों ने नए स्थलों पर बैरिकेडिंग और सीसीटीवी कैमरों की निगरानी बढ़ा दी है ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।








