बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से हलचल बहुत तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नाम और उनके राजनीतिक सफर को लेकर राज्य में एक तरफ जहां सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अंदरूनी खींचतान भी सतह पर आ रही है। हाल ही में मैसूरु में सिद्धारमेश्वर जयंती का आयोजन हुआ, जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुद किया। इसके अलावा मैसूरु में ही 'स ' यानी सिद्धारमैया कला केंद्र को लेकर भी स्थानीय स्तर पर काफी चर्चा है। लेकिन इन सबके बीच राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में कुछ ऐसे बड़े घटनाक्रम हुए हैं जिन्होंने सियासी गलियारों का पारा पूरी तरह चढ़ा दिया है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहा सत्ता का आंतरिक समीकरण। हाल ही में कर्नाटक सरकार के मंत्री एच.के. पाटिल के एक बयान ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। मंत्री पाटिल के हवाले से सामने आए बयानों के बाद सियासी बाजार में यह चर्चा जोरों पर है कि उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार आने वाले समय में कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की कमान संभाल सकते हैं। कांग्रेस पार्टी के भीतर मची इस सुगबुगाहट ने पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह नए राजनीतिक समीकरणों पर बहस छेड़ दी है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर पार्टी आलाकमान ने इस पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है, लेकिन मंत्रियों के बयानों से हवा का रुख साफ महसूस किया जा सकता है।
मैसूरु से लेकर बेंगलुरु तक मूर्ति विवाद का साया
राजनीतिक बयानबाजी के इस दौर के बीच मैसूरु और आसपास के इलाकों में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़ा एक अजीबोगरीब मामला भी सामने आया। कर्नाटक कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और खींचतान के माहौल के बीच एक जगह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मूर्ति स्थापित करने की कोशिश की गई, लेकिन उस मूर्ति का जीवन बहुत ही छोटा साबित हुआ। राज्य की राजनीति में इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या इस तरह की मूर्तियों की स्थापना से पार्टी के भीतर गुटबाजी को बढ़ावा मिल रहा है या फिर यह नेताओं के बीच शक्ति प्रदर्शन का नया जरिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसे घटनाक्रम इस बात का संकेत हैं कि राज्य इकाई में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और आने वाले दिनों में नेतृत्व को लेकर कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्य प्रशासन और मंत्रिमंडल में बड़े पैमाने पर फेरबदल की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में वायरल हो रही खबरों के मुताबिक, सिद्धारमैया मंत्रिमंडल से करीब 12 मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है या उनके विभागों में बड़ा बदलाव किया जा सकता है। इसे लेकर हाल ही में कई राजनीतिक बुलेटिन और वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की तारीखों पर कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि सरकार की तरफ से अभी तक इन बदलावों पर कोई अंतिम मुहर नहीं लगाई गई है, लेकिन विधायकों और मंत्रियों के बीच बैठकों का दौर लगातार जारी है।
स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति
मैसूरु, बेंगलुरु और अन्य जिलों में घूम रहे हमारे ग्राउंड रिपोर्टर्स ने पाया कि आम जनता और स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच इस समय असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक तरफ जहां सरकार विकास कार्यों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे कि सिद्धारमेश्वर जयंती के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ नेतृत्व परिवर्तन की खबरों ने विकास के मुद्दों को पीछे धकेल दिया है। आम लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर राज्य में सरकार जनता के कामों पर ध्यान दे रही है या फिर कुर्सी की इस लड़ाई में उलझकर रह गई है। विपक्षी दल भी इस अंदरूनी कलह का पूरा फायदा उठाने की फिराक में हैं और लगातार सरकार पर निशाना साध रहे हैं।
राज्य के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो कर्नाटक में नेतृत्व को लेकर खींचतान कोई नई बात नहीं है, लेकिन मौजूदा समय में यह संघर्ष ज्यादा तीखा नजर आ रहा है। एक तरफ सिद्धारमैया गुट अपनी जमीन मजबूत करने में जुटा है, तो दूसरी तरफ डी.के. शिवकुमार के समर्थक पार्टी के भीतर उनके बढ़ते कद को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले हफ्तों में दिल्ली दरबार से आने वाला कोई भी निर्देश कर्नाटक की राजनीति की दिशा तय करेगा। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई आधिकारिक पुष्टि होगी, हम सबसे पहले आप तक सटीक खबर पहुंचाएंगे।
नेतृत्व परिवर्तन के कयास और आगे की राजनीतिक चालें
कर्नाटक कांग्रेस के इन घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में आने वाला समय राजनीतिक रूप से बहुत उथल-पुथल भरा होने वाला है। मंत्रियों के बयानों, मूर्ति विवाद और मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाओं ने राज्य के प्रशासनिक तंत्र को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। अधिकारी वर्ग भी इस बात को लेकर पसोपेश में है कि आने वाले दिनों में उनके रिपोर्टिंग बॉस कौन होंगे। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि कर्नाटक की सियासत में पर्दे के पीछे बहुत कुछ पक रहा है जो जल्द ही सतह पर आ सकता है।










