नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण एक बार फिर तेजी से बदल रहे हैं। यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बाद मक्का रक्षा समझौता आधिकारिक रूप से सक्रिय हो गया है। इस रणनीतिक समझौते के तहत तुर्की और पाकिस्तान ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपने सैन्य बलों को वहां भेजने का बड़ा फैसला लिया है। इन दोनों देशों की सेनाएं अब सऊदी धरती पर मोर्चा संभालेंगी ताकि किसी भी बाहरी खतरे का डटकर मुकाबला किया जा सके।
बीबीसी न्यूज़ हिंदी और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस समझौते पर सहमति पिछले कुछ दिनों में तेजी से बने घटनाक्रम के बाद आई है। सऊदी अरब की सुरक्षा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का अहम हिस्सा रही है। हूती विद्रोहियों द्वारा तेल ठिकानों और अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने के बाद रियाद प्रशासन ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने का फैसला किया। इसी कड़ी में तुर्की और पाकिस्तान के साथ हुए पुराने रक्षा समझौतों को जमीन पर उतारने का काम शुरू कर दिया गया है।
सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए तुर्की और पाकिस्तान का बड़ा कदम
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग का इतिहास काफी पुराना रहा है। नभभारत टाइम्स और लोकमत जैसी मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि दोनों देशों के बीच 1960 के दशक से ही सैन्य और सामरिक रिश्ते रहे हैं। हालांकि, समय-समय पर भू-राजनीतिक दबावों के कारण समझौतों के क्रियान्वयन में संशय भी देखा गया है। इस बार हालात पूरी तरह अलग हैं क्योंकि सीधे तौर पर पवित्र स्थलों और ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा पर आंच आ रही है।
जागरण जोश और ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना और तुर्की के सैन्य विशेषज्ञ संयुक्त रूप से सऊदी सुरक्षा बलों की मदद करेंगे। यमन की सीमा से सटे इलाकों में हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम करने के लिए विशेष एयर डिफेंस सिस्टम और जमीनी सैनिकों की तैनाती की जा रही है। तुर्की के अत्याधुनिक ड्रोन और सैन्य साजो-सामान इस मिशन में अहम भूमिका निभा सकते हैं, जिससे सऊदी अरब की रक्षा क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीतिक हलकों में मची खलबली
इस सैन्य तैनाती के बाद से खाड़ी देशों और वैश्विक स्तर पर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि तुर्की और पाकिस्तान का एक साथ सऊदी अरब के पाले में खड़े होना पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन को नया आकार दे सकता है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ यह मोर्चाबंदी आने वाले दिनों में क्षेत्र के संघर्ष को और व्यापक बना सकती है। हालांकि, रियाद और उसके सहयोगियों का साफ कहना है कि यह कदम पूरी तरह से उनकी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा के लिए उठाया गया है।
भारतीय सामरिक विशेषज्ञों की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है क्योंकि पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा दारोमदार इसी क्षेत्र पर है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए भी चिंता का विषय है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस त्रिपक्षीय सैन्य सहयोग से हूती हमलों पर लगाम लग पाती है या क्षेत्रीय तनाव और अधिक गहराता है।





