नई दिल्ली और कोलकाता से आ रही राजनीतिक खबरें देश का पारा एक बार फिर बढ़ा रही हैं। दिल्ली विधानसभा के सत्र के दौरान मणिपुर के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच जोरदार तनातनी देखने को मिली। हंगामा इतना बढ़ गया कि सदन की कार्यवाही बाधित हुई और मार्शलों को बुलाना पड़ा। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सदन के नियमों का हवाला देते हुए पांच भाजपा विधायकों को मार्शलों की मदद से तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह घटना देश की राजधानी की विधायी राजनीति में बढ़ते टकराव का एक नया उदाहरण बन गई है।
दूसरी ओर पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में भी सियासी सरगर्मी अपने चरम पर है। यहां तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच बयानों का दौर लगातार जारी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि सत्ताधारी दल के कुछ विधायक पाला बदलकर विरोधी खेमे में जा सकते हैं। इस प्रकार की अटकलों ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। हालांकि दोनों तरफ के वरिष्ठ नेता इन दावों पर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और अपनी पार्टी की मजबूती का दावा कर रहे हैं। इस दांव-पेच के बीच आम जनता की नजरें राज्य के राजनीतिक भविष्य पर टिकी हुई हैं।
सांस्कृतिक आयोजनों में नेताओं की सक्रियता
राजनीतिक उठापटक के बीच जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्रों में लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। दुर्गा पूजा जैसे बड़े आयोजनों की तैयारियों और उद्घाटन कार्यक्रमों में स्थानीय विधायकों की मौजूदगी बढ़ गई है। कोलकाता के पूर्वाचल हम सब क्लब द्वारा आयोजित होने वाले आगामी उत्सव के पूर्वाभ्यास और उद्घाटन समारोह में स्थानीय विधायक शरी मुखर्जी की उपस्थिति चर्चा का विषय रही। नेता एक तरफ जहां सदन में तीखी बहस का हिस्सा बन रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक और सांस्कृतिक मंचों के जरिए जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।
सांस्कृतिक मेलों और वार्षिकोत्सवों के इस दौर में कला जगत को श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रम भी हो रहे हैं। टॉली स्टूडियो में दिवंगत फिल्म निर्माता अनिक को अंतिम विदाई देने के लिए नंदन और एनटी1 जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्रों पर श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की गईं। इन आयोजनों में भी कई गणमान्य व्यक्तियों और जनप्रतिनिधियों ने पहुंचकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच कलाकारों को याद करने के इन आयोजनों ने यह साबित कर दिया कि राजनीति से परे भी समाज में संवेदनाओं का एक बड़ा दायरा मौजूद है जो सभी को जोड़ता है।
पत्रकारों के नाम पत्र और वैचारिक बहस
विधायकों और राजनीतिक गतिविधियों के इतर साहित्यिक और ऐतिहासिक बहसों का दौर भी जारी है। बांकीपुर और बंकिम चंद्र चटर्जी के पत्रों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित खबरें बुद्धिजीवी वर्ग के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। अखबारों और मीडिया रिपोर्ट्स में इन पत्रों के माध्यम से अतीत के कई अनछुए पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। समकालीन राजनीति के शोरगुल के बीच इस प्रकार की बौद्धिक चर्चाएं समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं कि इतिहास और वर्तमान के धागे किस प्रकार आपस में जुड़े हुए हैं।
द फ्रीलान्स की इस विशेष पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विधायक और राजनीतिक दल अपनी जमीन बचाने और मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। चाहे वह सदन के भीतर अनुशासनहीनता के नाम पर हुई कार्रवाई हो या फिर मैदान पर जनता के बीच पैठ बनाने की होड़, हर जगह सियासत अपने चरम पर है। आने वाले दिनों में इन राजनीतिक समीकरणों का असर चुनावी राज्यों की दिशा और दशा दोनों पर पड़ना तय माना जा रहा है, जिस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।








