नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के शिवाजी पार्क तक इन दिनों एक नया राजनीतिक तूफान उठा हुआ है। चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र की शुचिता पर सवाल उठाते हुए 'वोट-चोरी' के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। इन प्रदर्शनों के बीच एक बड़ी बहस यह छिड़ गई है कि क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सिविल सोसाइटी व अन्य संगठनों यानी CJP के बीच इस आंदोलन का श्रेय लेने की कोई होड़ मची हुई है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल की, तो कई चौकाने वाले और दिलचस्प पहलू सामने आए जो आम जनता के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं।
बीते कुछ हफ्तों में जिस तरह से अलग-अलग मंचों से चुनाव प्रणाली और ईवीएम को लेकर सवाल उठाए गए हैं, उसने राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। राहुल गांधी लगातार अपनी रैलियों और भाषणों में यह मुद्दा उठा रहे हैं कि जनता के मतों के साथ खिलवाड़ हो रहा है। दूसरी ओर, विभिन्न नागरिक संगठन और एक्टिविस्ट समूह भी लगातार जमीन पर उतरकर लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्टूडियो तक यह कयास लगाए जाने लगे कि क्या विपक्ष और नागरिक समाज इस आंदोलन के नेतृत्व को लेकर आमने-सामने आ गए हैं।
जंतर-मंतर से शिवाजी पार्क तक सड़कों पर उतरा विपक्ष
जमीनी हकीकत यह है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब विरोध प्रदर्शन की शुरुआत हुई, तो वहां सिर्फ राजनीतिक चेहरे ही नजर नहीं आए, बल्कि देश के कोने-कोने से आए आम लोग, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में शामिल थे। राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव जैसे बड़े नेता जब इन मंचों पर पहुंचे, तो भीड़ का उत्साह और समर्थन देखने लायक था। वक्ताओं ने साफ शब्दों में कहा कि यह लड़ाई किसी एक पार्टी की नहीं बल्कि देश के हर उस वोटर की है जो अपने मत की सुरक्षा चाहता है। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना था कि इस समय पार्टी के झंडे से ऊपर उठकर देश के संविधान को बचाने की जरूरत है।
लेकिन जैसे ही मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर इन कार्यक्रमों का कवरेज शुरू हुआ, बहस का रुख थोड़ा बदल गया। मीडिया रिपोर्टों में यह सवाल बार-बार उछाला जाने लगा कि क्या राहुल गांधी इस पूरे आंदोलन पर हावी होते जा रहे हैं और CJP जैसे संगठन जो जमीनी स्तर पर लंबे समय से काम कर रहे थे, वे कहीं पीछे छूट गए हैं। इस सवाल पर जब हमने कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रदर्शन में शामिल युवाओं से बात की, तो उन्होंने इस तरह की किसी भी होड़ या विवाद को सिरे से खारिज कर दिया। उनका साफ कहना था कि आंदोलन जितना बड़ा होगा, उसमें नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका उतनी ही अहम होगी, और इसमें क्रेडिट की कोई बात ही नहीं है।
क्रेडिट की राजनीति या जनता के अधिकारों की असली लड़ाई
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब भी विपक्ष कोई बड़ा राष्ट्रव्यापी मुद्दा उठाता है, तो उसकी कमान अक्सर देश के बड़े नेताओं के हाथ में चली जाती है। राहुल गांधी का इन विरोध प्रदर्शनों में आगे रहना स्वाभाविक भी है क्योंकि वह देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि नागरिक संगठनों के योगदान को नजरअंदाज किया जा रहा है। अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी अपने संबोधनों में इस बात पर जोर दिया है कि जनता का विश्वास जीतना ही इस आंदोलन का सबसे बड़ा मकसद है, न कि यह देखना कि मंच पर कौन सबसे आगे खड़ा है।
आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर अब स्पष्टता आ रही है कि यह विवाद केवल मीडिया की सुर्खियों तक सीमित है। जो लोग खुद जंतर-मंतर और शिवाजी पार्क की रैलियों में शामिल हुए, उनका मानना है कि वोटर का साथ रहना या छिटकना किसी एक भाषण से तय नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जनता के मुद्दों को कितनी ईमानदारी से उठाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक वोटर अब बहुत समझदार हो चुका है और वह जानता है कि उसके अधिकारों की रक्षा कौन कर रहा है और कौन सिर्फ राजनीति कर रहा है।
आने वाले दिनों में और तेज होगी चुनावी प्रक्रिया पर बहस
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि 'वोट-चोरी' प्रोटेस्ट को लेकर राहुल गांधी और CJP के बीच किसी भी तरह की तल्खी या श्रेय की लड़ाई जमीन पर नजर नहीं आती है। यह एक साझा मंच है जहां राजनीतिक दल और नागरिक समाज एक ही दिशा में प्रयास कर रहे हैं। आने वाले समय में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, इस तरह के मुद्दों पर बहस और तीखी होने की पूरी संभावना है। लेकिन अंत में फैसला जनता को ही करना है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए उठने वाली इन आवाजों में कितना दम है और कौन सा दल उनकी उम्मीदों पर खरा उतरता है।




