वाशिंगटन और मॉस्को से आ रही ताजा खबरों ने एक बार फिर दुनिया की निगाहें रूस-यूक्रेन युद्ध पर टिका दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक नया बयान देकर सबको चौंका दिया है। ट्रम्प का कहना है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की की तुलना में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शांति समझौता करने के लिए ज्यादा उत्सुक हैं। यह बयान ऐसे समय पर आया है जब युद्ध के मैदान में शांति की उम्मीदें लगातार कम होती जा रही हैं और दोनों देशों के बीच हमले और तेज हो गए हैं।
इस राजनीतिक बयानबाजी के ठीक दो दिन पहले जमीन पर जो हुआ, उसने शांति वार्ताओं के दावों की पोल खोल दी है। एनर्जी सीजफायर यानी ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के दावों के महज 48 घंटे के भीतर ही रूस ने यूक्रेन के छह अहम ऊर्जा ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए। इन हमलों के बाद यूक्रेन के कई शहरों में बिजली और पानी का संकट गहरा गया है। आम लोग एक बार फिर कड़ाके की ठंड के बीच बंकरों और शरणस्थलों में रहने को मजबूर हो गए हैं।
रूस और यूक्रेन के बीच ऊर्जा ठिकानों पर क्यों तेज हुए हमले?
रूस की सेना पिछले कई महीनों से यूक्रेन के पावर ग्रिड और बिजलीघरों को अपना मुख्य निशाना बना रही है। सर्दियों का मौसम शुरू होते ही इन हमलों का मकसद यूक्रेन के नागरिकों का मनोबल तोड़ना है। ताजा हमलों में छह अलग-अलग क्षेत्रों में ऊर्जा संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा है। यूक्रेन के अधिकारियों का कहना है कि रूस शांति की बात सिर्फ दिखावे के लिए कर रहा है, जबकि असलियत में वह देश को पूरी तरह अंधेरे में धकेलना चाहता है।
दूसरी तरफ, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति या नेता के रूप में ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि वे इस युद्ध को बहुत जल्दी खत्म करवा सकते हैं। ट्रम्प का मानना है कि उनकी व्यक्तिगत कूटनीति पुतिन और जेलेंस्की दोनों को बातचीत की मेज पर लाने में कामयाब होगी। लेकिन जमीन पर हो रहे इन हमलों ने साबित कर दिया है कि कूटनीतिक बयानों और युद्ध के मैदान की कड़वी सच्चाई के बीच बहुत बड़ा फर्क है। पुतिन और जेलेंस्की दोनों के अपने राजनीतिक और सामरिक हित दांव पर हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर इस तनाव का क्या होगा असर?
इस बीच दुनिया के अन्य देश भी इस स्थिति पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। यूरोपीय देश यूक्रेन को लगातार हथियार और वित्तीय मदद दे रहे हैं ताकि वह रूसी हमलों का डटकर मुकाबला कर सके। वहीं, भारत समेत कई विकासशील देश लगातार यह अपील कर रहे हैं कि युद्ध को तुरंत रोककर बातचीत से मसला हल किया जाना चाहिए। लेकिन जब तक दोनों पक्ष किसी ठोस समझौते पर सहमत नहीं होते, तब तक आम जनता को ही इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस युद्ध को रोकने के लिए कौन सा नया फॉर्मूला लेकर आता है। क्या ट्रम्प के दबाव से रूस और यूक्रेन सचमुच किसी शांति समझौते के करीब पहुंच पाएंगे या फिर यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाएगी। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी अंतरराष्ट्रीय घटना पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और आपको हर ताजा अपडेट से लगातार अवगत कराता रहेगा।
सीमा विवाद और वैश्विक कूटनीति के मोर्चे पर अन्य हलचल
वैश्विक स्तर पर सिर्फ रूस-यूक्रेन का मुद्दा ही नहीं, बल्कि एशियाई मोर्चे पर भी तनाव बना हुआ है। हाल ही में चीन ने एक बार फिर लद्दाख की 28 जगहों के नाम बदलने पर आपत्ति जताई और उन्हें अपना हिस्सा बताया है। भारत ने इसका कड़ा जवाब देते हुए साफ कर दिया है कि नाम बदलने से भौगोलिक वास्तविकता नहीं बदलती। इन तमाम अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के बीच दुनिया एक बार फिर नए शक्ति संतुलन की दौर से गुजर रही है।










