वाशिंगटन/नई दिल्ली — अमेरिका से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ी और बुरी खबर सामने आई है। अमेरिकी प्रशासन ने परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम यानी पर्म सिस्टम पर बड़ी कार्रवाई की है। इस सख्त कदम के दायरे में देश की दिग्गज आईटी कंपनियां जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस और विप्रो समेत कुल आठ बड़ी कंपनियां आ गई हैं। इन सभी कंपनियों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया को फिलहाल रोक या निलंबित कर दिया गया है। इस अचानक आए फैसले से अमेरिका की धरती पर अपनी मेहनत के दम पर काम कर रहे हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
यह पूरा मामला अमेरिका में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को मिलने वाले परमानेंट रेजिडेंट वीजा यानी ग्रीन कार्ड से जुड़ा हुआ है। नियमों के मुताबिक कोई भी कंपनी अपने उन कर्मचारियों के लिए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है जिन्हें वह अमेरिका में स्थाई रूप से रखना चाहती है। लेकिन ताजा प्रशासनिक आदेश के बाद टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों के कर्मचारियों के आवेदन फंस गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस निलंबन की वजह से अमेरिका में अपनी नौकरी और करियर के भविष्य को लेकर गहरी चिंता में डूबे भारतीय प्रोफेशनल्स की संख्या लगभग एक लाख के आसपास बताई जा रही है।
गोल्डन केज में फंसे एक लाख से अधिक भारतीय
इस पूरी स्थिति ने अमेरिका में नौकरी कर रहे भारतीय युवाओं को एक अजीब असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। जानकारों का कहना है कि एच-1बी वीजा पर अमेरिका गए ये लोग अब एक तरह के 'गोल्डन केज' यानी सुनहरे पिंजरे में फंस गए हैं। उनके पास अच्छी नौकरी और भारी-भरकम पैकेज तो है, लेकिन ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद होने की वजह से वे चाहकर भी न तो स्वतंत्र रूप से नौकरी बदल पा रहे हैं और न ही अपने भविष्य को लेकर कोई पक्का फैसला ले पा रहे हैं। अमेरिका में परमानेंट सेटल होने का सपना देख रहे इन परिवारों के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है क्योंकि सालों की प्रतीक्षा के बाद अब उनकी फाइलें अटक गई हैं।
भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार हमेशा से सबसे बड़ा और अहम कारोबार केंद्र रहा है। ऐसे में पर्म प्रोग्राम का यह निलंबन न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर कर्मचारियों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि इन बड़ी कंपनियों की मानव संसाधन नीतियों के सामने भी बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। कंपनियों को अपने सबसे प्रतिभाशाली और अनुभवी कर्मचारियों को अमेरिका में रोककर रखने के लिए अब नए और वैकल्पिक रास्तों की तलाश करनी होगी। एच-1बी वीजा की मियाद खत्म होने से पहले यदि यह रोक नहीं हटती है, तो कंपनियों को अपने इन कर्मचारियों को वापस भारत या अन्य देशों के दफ्तरों में ट्रांसफर करना पड़ सकता है।
अमेरिकी श्रम विभाग की जांच और कड़े नियम
सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार अमेरिकी श्रम विभाग द्वारा विदेशी श्रमिकों की भर्ती प्रक्रिया और वीजा नियमों के पालन की गहन समीक्षा की जा रही है। इसी आंतरिक जांच और नीतिगत बदलावों के तहत यह निलंबन की कार्रवाई की गई है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि स्थानीय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और श्रम बाजार में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस तरह के सख्त कदम उठाने जरूरी हो गए थे। हालांकि, इसका सीधा और सबसे बड़ा असर उन मेहनती भारतीय इंजीनियरों पर पड़ा है जो पिछले कई सालों से अमेरिका की अर्थव्यवस्था में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे थे।
दूसरी ओर, प्रभावित आईटी कंपनियों की तरफ से भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखी जा रही है। कंपनियों के कानूनी सलाहकार और मानवाधिकार विशेषज्ञ इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि इस निलंबन को कितनी जल्दी कानूनी या प्रशासनिक संवाद के जरिए ठीक किया जा सके। भारतीय उद्योग जगत और कूटनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर चिंता जताई जा रही है। आने वाले कुछ हफ्तों में यह साफ हो पाएगा कि अमेरिकी प्रशासन इन कंपनियों पर लगाई गई इस रोक को पूरी तरह से हटाता है या इसमें कुछ शर्तों के साथ ढील दी जाती है।
भारतीय आईटी सेक्टर पर इसका दूरगामी असर
अमेरिका के इस फैसले से केवल ग्रीन कार्ड के आवेदक ही प्रभावित नहीं हो रहे हैं, बल्कि पूरी भारतीय आईटी इंडस्ट्री की व्यावसायिक रणनीति पर भी इसका असर पड़ना तय है। जब अमेरिका में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए स्थाई निवास का रास्ता बंद होता है, तो कंपनियों के लिए वहां नई प्रतिभाओं को आकर्षित करना भी मुश्किल हो जाता है। कर्मचारी अमेरिका जाने से कतराने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां भविष्य की अनिश्चितता का डर सता रहा है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में भारतीय तकनीकी कंपनियों को अपनी वैश्विक कामकाज की रूपरेखा में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। वे अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता को थोड़ा कम करके यूरोप और अन्य उभरते बाजारों में अपने पैर जमाने की कोशिश कर सकती हैं। फिलहाल, अमेरिका में रह रहे उन एक लाख भारतीयों की निगाहें वाशिंगटन के दफ्तरों पर टिकी हैं, जिनकी सांसें इस एक अदद ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के शुरू होने का इंतजार कर रही हैं।








