नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — सोशल मीडिया की दुनिया में हर दिन कोई न कोई गाना रातों-रात ट्रेंडिंग लिस्ट में आ जाता है। इन दिनों इंस्टाग्राम और अन्य शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर 'छलरे-छलरे वाल' नाम का एक पुराना लोकगीत इंटरनेट पर छाया हुआ है। इस गाने की धुन पर देश भर के युवा और क्रिएटर लगातार वीडियो बना रहे हैं। लाखों व्यूज और लाइक्स बटोर रहे इस गाने को लेकर लोगों में एक बड़ा असमंजस बना हुआ है। इंटरनेट पर बड़ी संख्या में लोग इसे एक नया या पुराना पंजाबी गाना मान रहे हैं। लेकिन, जमीनी पड़ताल और लोक संगीत के जानकारों के मुताबिक इस गाने का सच कुछ और ही है।
इस वायरल हो रहे लोकगीत के बोल और इसकी भाषा को लेकर जब हमने तहकीकात की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। लोगों की यह धारणा बिल्कुल गलत है कि यह कोई पंजाबी गाना है। असल में यह गाना सराइकी भाषा से ताल्लुक रखता है। सराइकी भाषा मुख्य रूप से पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। यह करीब साठ साल पुराना एक पारंपरिक लोकगीत है। जो लड़कों की सुंदरता और उनकी खूबसूरती का बखान करता है। सरहद पार से ताल्लुक रखने वाला यह लोकगीत दशकों बाद सोशल मीडिया के जरिए भारत के युवाओं की जुबान पर चढ़ गया है। इंस्टाग्राम की रील्स ने इस पुरानी कला को एक बार फिर से नई पहचान दे दी है।
साठ साल पुराना इतिहास और सरहद पार से कनेक्शन
संगीत की कोई सरहद नहीं होती, यह बात एक बार फिर साबित हो गई है। साठ साल पहले रचा गया यह गीत आज डिजिटल युग में सरहद पार करके भारतीय दर्शकों के दिलों पर राज कर रहा है। मूल रूप से सराइकी संस्कृति का यह गीत नौजवानों के पहनावे और उनके रूप-रंग की तारीफ में गाया जाता था। उस दौर के लोक कलाकारों ने इसे अपनी स्थानीय बोली में पिरोया था। आज जब यह गाना सोशल मीडिया के एल्गोरिदम में फिट बैठा, तो भारत के आम यूजर्स ने इसे हाथों-हात लिया। भाषा की दीवार टूटी और लोग इसका मतलब समझे बिना ही इसकी सुरीली धुन पर थिरकने लगे। यह इस बात का बड़ा उदाहरण है कि कैसे सोशल मीडिया पुरानी कला को नया जीवन दे देता है, भले ही उसकी मूल पहचान थोड़ी धुंधली पड़ जाए।
दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ 'छलरे-छलरे वाल' ही नहीं, बल्कि ऐसे कई अन्य पारंपरिक गीत भी आज के दौर में इंटरनेट पर पुनर्जीवित हो रहे हैं। कुछ समय पहले 1965 का प्रसिद्ध गाना 'लौंग गवाचा' भी इसी तरह सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर चुका है। यूट्यूब पर करोड़ों व्यूज बटोरने वाला वह गाना आज भी संगीत प्रेमियों की पहली पसंद बना हुआ है। इन पुरानी धुनों का दोबारा वायरल होना यह बताता है कि आज की पीढ़ी को पुरानी और मौलिक लोक धुनें खूब भा रही हैं। भले ही लोगों को यह पता न हो कि गाने के बोल किस भाषा में हैं, लेकिन उसकी ऊर्जा और संगीत लोगों को अपनी ओर खींच रहा है।
राजनीतिक मंचों और आम बोलचाल में पंजाबी संगीत का क्रेज
दूसरी ओर, अगर भारत के मुख्यधारा के संगीत बाजार की बात करें, तो पंजाबी गानों और उनकी खास 'वाइब' का जलवा हर जगह कायम है। चाहे शादियों का सीजन हो, कोई पार्टी हो या फिर राजनीतिक रैलियां, पंजाबी गानों के बिना रौनक अधूरी मानी जाती है। हाल ही में हरियाणा के फतेहाबाद में एक दिलचस्प वाकया सामने आया था। जब एक राजनीतिक भाषण के बीच अचानक 'केहा सी ना बाबा माल तेज आ' जैसी पंक्तियां बज उठीं। उस मंच पर मौजूद नेताओं से लेकर आम जनता तक सब अपनी हंसी नहीं रोक पाए। यह घटना इस बात का सबूत है कि पंजाबी और उत्तर भारतीय लोक संगीत की धुनें लोगों के दैनिक जीवन में कितनी गहराई तक रची-बसी हैं।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर चीज़ वैसी नहीं होती जैसी दिखती है। 'छलरे-छलरे वाल' जैसे गाने भले ही आज पंजाबी गानों के नाम पर परोसे जा रहे हों, लेकिन यह क्षेत्रीय लोक संगीत की विविधता को भी दर्शाते हैं। सराइकी भाषा के इस प्राचीन गीत का भारत में यूं लोकप्रिय होना यह दिखाता है कि संगीत भावनाओं की भाषा बोलता है। आने वाले दिनों में और भी कई पुरानी लोक कलाएं इंटरनेट के जरिए सामने आ सकती हैं। बस जरूरत इस बात की है कि हम किसी भी धुन पर झूमने के साथ-साथ उसकी मूल संस्कृति और सही इतिहास को भी समझें।








