नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली से लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क तक इन दिनों राजनीतिक हलचल काफी तेज हो गई है। चुनावी प्रक्रिया और वोटिंग प्रणाली में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर विपक्ष लगातार सड़कों पर उतर रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन विरोध प्रदर्शनों की अगली कतार में खड़े नजर आ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, नागरिक अधिकार मंच यानी सीजेपी और अन्य संगठन भी इन मुद्दों को लगातार उठा रहे हैं। आम जनता के मन में अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या इन विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई को लेकर किसी तरह की होड़ मची है।
हाल के दिनों में जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में हुए आयोजनों ने राजनीतिक गलियारों का पारा बढ़ा दिया है। राहुल गांधी लगातार चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनता को आगे आना होगा। दूसरी तरफ, विभिन्न सामाजिक और नागरिक संगठन लंबे समय से इन मुद्दों पर कानूनी और जमीनी लड़ाई लड़ते रहे हैं। अब मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इन आंदोलनों का असली क्रेडिट किसी एक नेता को मिल रहा है या यह सामूहिक प्रयास है।
जंतर-मंतर से शिवाजी पार्क तक गूंजे नारे
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क तक हाल ही में कई बड़े विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं। इन आयोजनों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता शामिल हुए। मंचों से लगातार यह संदेश देने की कोशिश की गई कि विपक्ष एकजुट होकर सरकार को घेर रहा है। प्रदर्शनों में शामिल होने वाले युवाओं और आम नागरिकों का कहना है कि उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कौन सी पार्टी आगे है। उनके लिए मुख्य मुद्दा उनके मताधिकार की सुरक्षा करना और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल पूछना है।
जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का मानना है कि नागरिक समाज के संगठनों ने इस मुद्दे को बहुत पहले उठाना शुरू कर दिया था। जब मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां खामोश थीं, तब छोटे संगठन और एनजीओ लोगों के बीच जागरूकता फैला रहे थे। अब जब कांग्रेस और अन्य बड़े दल इस आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं, तो पूरी लाइमलाइट राजनीतिक नेताओं की तरफ शिफ्ट हो गई है। यही वजह है कि विश्लेषक इसे राजनीतिक श्रेय की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं, जहां हर कोई खुद को मुख्य चेहरा साबित करना चाहता है।
क्या वाकई क्रेडिट लेने की कोई होड़ मची है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र में हर दल और संगठन अपनी जमीन मजबूत करना चाहता है। जब कोई बड़ा आंदोलन सफल होने लगता है, तो उसका नेतृत्व अपने नाम करने की होड़ शुरू हो जाती है। राहुल गांधी की रैलियों और भाषणों के बाद इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कवरेज मिल रही है। कांग्रेस पार्टी का दावा है कि राहुल गांधी ही इस देश में विपक्ष की मुख्य आवाज बनकर सरकार को चुनौती दे रहे हैं। वहीं, नागरिक संगठनों से जुड़े लोग दबे स्वर में यह भी कहते हैं कि जमीन पर पसीना उन्होंने बहाया है और राजनीतिक दल इसका फायदा उठा रहे हैं।
आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि जब तक आंदोलन मजबूत हो रहा है, तब तक यह मायने नहीं रखता कि उसका नेतृत्व कौन कर रहा है। वहीं कुछ जागरूक नागरिकों का कहना है कि राजनीतिक दलों के शामिल होने से जन आंदोलनों की मूल भावना कई बार भटक जाती है। वे पार्टी विशेष के एजेंडे में बदलकर रह जाते हैं। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में यह अभियान किस दिशा में आगे बढ़ता है।
विपक्ष की आगे की रणनीति और जनता का मूड
आगामी चुनावों और राजनीतिक भविष्य को देखते हुए विपक्ष इन मुद्दों को आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं है। राहुल गांधी लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर युवाओं और किसानों से संवाद कर रहे हैं। उनका यह आक्रामक रुख पार्टी कार्यकर्ताओं में तो जोश भर रहा है, लेकिन इसका चुनावी फायदा कितना मिलेगा, यह वक्त बताएगा। नागरिक संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच का यह अनकहा मुकाबला आने वाले दिनों में और भी गहरा सकता है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जमीनी सच आप तक पहुंचाती रहेगी।




