नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में इन दिनों भारत के चुनाव आयोग यानी इलेक्शन कमीशन की भूमिका को लेकर चर्चा जोरों पर है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग इस बात पर लंबी बहस कर रहे हैं कि देश में चुनाव कितने निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स पर पिछले चौबीस घंटों के दौरान इस विषय को लेकर सर्च में जबरदस्त उछाल देखा गया है। आम नागरिक से लेकर राजनीतिक दलों तक हर कोई चुनाव आयोग के फैसलों और कामकाज के तौर-तरीकों पर बारीकी से नजर बनाए हुए है।
चुनावी प्रक्रिया को देश के लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है और इसे सुरक्षित रखना आयोग की मुख्य जिम्मेदारी है। पिछले कुछ चुनावों के दौरान विपक्षी दलों ने आयोग के सामने कई बार अपनी शिकायतें रखी हैं। इन शिकायतों में वीवीपैट मशीनों की गिनती, आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन और सोशल मीडिया पर फैलने वाली फर्जी खबरों पर रोक लगाने जैसे गंभीर मुद्दे शामिल रहे हैं। आयोग की तरफ से समय-समय पर इन सवालों के जवाब दिए गए हैं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने का दावा भी किया गया है।
मतदाता सूचियों की शुद्धता और पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल
जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं कि मतदाता सूचियों को पूरी तरह साफ-सुथरा रखा जाए। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि चुनाव के ठीक पहले कई वैध मतदाताओं के नाम सूचियों से गायब मिलते हैं। इससे मतदान के दिन आम लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है और वे अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। चुनाव आयोग ने इस समस्या से निपटने के लिए कई डिजिटल पोर्टल और मोबाइल ऐप लॉन्च किए हैं, ताकि लोग घर बैठे अपना नाम जांच सकें।
इसके बावजूद सुदूर गांवों और कस्बों में रहने वाले लोगों के लिए इन डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठाना आसान नहीं होता है। बूथ लेवल अधिकारियों यानी बीएलओ की जिम्मेदारी होती है कि वे घर-घर जाकर सही जानकारी जुटाएं, लेकिन कई जगहों पर लापरवाही की शिकायतें मिलती हैं। राजनीतिक दलों का यह भी कहना है कि आयोग को मतदाता सूचियों के अपडेशन के काम में और अधिक तेजी दिखानी चाहिए। पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आयोग अब हर मतदान केंद्र की लाइव वेबकास्टिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है।
सोशल मीडिया और डिजिटल विज्ञापनों पर कड़ी नजर रखने की जरूरत
आज के दौर में चुनावों का प्रचार सिर्फ रैलियों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि सोशल मीडिया इसका सबसे बड़ा मैदान बन गया है। इंटरनेट पर राजनीतिक दलों द्वारा प्रसारित किए जाने वाले विज्ञापनों और वीडियो की बाढ़ आ जाती है। कई बार इन विज्ञापनों में ऐसे दावे किए जाते हैं जो समाज में भ्रम या तनाव पैदा कर सकते हैं। चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस डिजिटल प्रचार पर कैसे लगाम कसे और फेक न्यूज पर तुरंत रोक लगाए।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक के इस दौर में पारंपरिक नियम अब कम साबित हो रहे हैं। आयोग को तकनीकी जानकारों की एक ऐसी टीम की जरूरत है जो पल-पल बदल रहे डिजिटल ट्रेंड्स पर नजर रख सके। पिछले कुछ महीनों में आयोग ने कुछ सख्त दिशा-निर्देश जरूर जारी किए हैं, लेकिन उनका जमीनी स्तर पर पालन करवाना अभी भी एक कठिन काम है। मतदाता यह चाहते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान हर किसी को एक समान अवसर मिले और कोई भी गलत तरीके से फायदा न उठा सके।
भविष्य की तैयारियां और निष्पक्ष चुनाव की अटूट उम्मीद
भारत जैसे विशाल देश में चुनाव कराना दुनिया का सबसे बड़ा प्रशासनिक आयोजन माना जाता है। इसमें देश के सुरक्षा बलों, प्रशासनिक अधिकारियों और लाखों कर्मचारियों की महीनों की मेहनत शामिल होती है। चुनाव आयोग लगातार अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने की कोशिश कर रहा है ताकि हर मतदाता बिना किसी डर के मतदान कर सके। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर उठाए जाने वाले सवालों का भी आयोग ने तकनीकी विशेषज्ञों के सामने पारदर्शिता से जवाब दिया है।
आने वाले दिनों में देश के कई राज्यों में नए चुनाव होने हैं और आयोग के सामने अपनी साख को और मजबूत करने का बड़ा मौका है। आम जनता और बुद्धिजीवी वर्ग की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग निष्पक्षता के अपने वादे पर कितना खरा उतरता है। द फ्रीलान्स की इस पड़ताल से यह साफ है कि जब तक संस्थाएं पूरी तरह पारदर्शी नहीं होंगी, तब तक लोकतंत्र की नींव को मजबूत नहीं किया जा सकता है। जनता की जागरूकता ही किसी भी चुनाव आयोग को सही रास्ते पर चलने के लिए सबसे बड़ा बल देती है।






