बेंगलुरु और ग्रामीण इलाकों में इन दिनों हर चाय की दुकान पर सिर्फ एक ही चर्चा चल रही है। लोग मोबाइल पर लगातार सर्च कर रहे हैं कि उनका बकाया कर्ज माफ होगा या नहीं। कन्नड भाषा में इस प्रक्रिया को 'साला मन्ना' कहा जाता है। गूगल ट्रेंड्स पर पिछले कुछ घंटों में इस शब्द को खोजने वालों की संख्या अचानक बहुत बढ़ गई है। किसान परिवारों के मन में एक ही सवाल है कि क्या सरकार इस बार सचमुच उनका पूरा कर्ज माफ करेगी।
बैंकों के नोटिस और कर्ज के बढ़ते बोझ से परेशान किसान अब सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। कई सहकारी बैंकों ने किसानों को लोन चुकाने के लिए नए नोटिस भेजना शुरू कर दिया है। पिछले साल हुई कम बारिश और सूखे जैसे हालातों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। फसल बर्बाद होने के कारण किसान समय पर बैंक का पैसा नहीं लौटा पा रहे हैं। यही वजह है कि कर्ज माफी की मांग को लेकर गांवों में बैठकों का दौर फिर से तेज हो गया है।
बैंकों के नोटिस से बढ़ी किसानों की मुश्किलें
मैसूर और मांड्या जिलों के कई गांवों में हमने जाकर किसानों से सीधी बातचीत की। बुजुर्ग किसान रमेश गौड़ा ने बताया कि उन्होंने पिछले साल फसल के लिए सहकारी बैंक से डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लिया था। कीटों के हमले और बारिश की कमी के कारण उनकी धान की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। अब बैंक वाले हर हफ्ते घर आकर पैसा चुकाने का दबाव बना रहे हैं। रमेश जैसे हजारों किसान हर दिन बैंक के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
स्थानीय स्तर पर काम करने वाले किसान संगठनों का कहना है कि सरकार को तुरंत प्रभाव से बड़ा कदम उठाना चाहिए। नेताओं के बड़े-बड़े भाषणों के बावजूद जमीन पर हालात बहुत खराब हैं। कर्ज चुकाने में असमर्थ कई किसानों ने निजी साहूकारों से भी ऊंचे ब्याज पर पैसे ले रखे हैं। निजी साहूकारों का डर और बैंक की कानूनी कार्रवाई ने किसानों की नींद उड़ा दी है। ग्रामीण इलाकों में तनाव का माहौल साफ देखा जा सकता है।
राजनीतिक गलियारों में तेज हुई बयानबाजी
कर्ज माफी के इस मुद्दे पर अब राजनीतिक दलों के बीच भी जुबानी जंग शुरू हो गई है। विपक्षी दल सरकार पर वादाखिलाफी का गंभीर आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि चुनावों के दौरान किए गए वादों को पूरा करने में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष का दावा है कि वे किसानों की भलाई के लिए लगातार काम कर रहे हैं। मंत्रियों का कहना है कि पात्र किसानों की सूची तैयार की जा रही है और जल्द ही राहत राशि सीधे खातों में भेजी जाएगी।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सिर्फ कर्ज माफी से कृषि क्षेत्र की स्थाई समस्याएं हल नहीं हो सकती हैं। इसके लिए सिंचाई के बेहतर साधन और समय पर सही दाम मिलना बहुत जरूरी है। लेकिन तात्कालिक राहत के तौर पर कर्ज माफी ही किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा बनती है। जब तक बैंकों का डंडा किसानों पर चलता रहेगा, तब तक यह मुद्दा शांत होने वाला नहीं है। राजनीतिक दलों के लिए यह ग्रामीण वोटों को साधने का एक बड़ा हथियार बन गया है।
आगे क्या कदम उठा सकती है सरकार
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार इस मामले में एक नया और सख्त नियम लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता के आधार पर कर्ज से मुक्ति दी जाएगी। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सूखा प्रभावित इलाकों की ताजा रिपोर्ट जल्द से जल्द सरकार को सौंपें। इस रिपोर्ट के आने के बाद ही कर्ज माफी का दायरा और लाभार्थियों की अंतिम सूची फाइनल की जाएगी।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि कागजी योजनाओं और जमीन पर मिलने वाली राहत के बीच अभी भी बहुत बड़ा अंतर है। किसान अब सिर्फ आश्वासनों से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। वे चाहते हैं कि बैंकों के कर्ज से मुक्ति का कोई ठोस और पक्का रास्ता निकाला जाए। आने वाले कुछ हफ्तों में इस पर कोई बड़ा फैसला आने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है। तब तक किसानों की निगाहें हर रोज आने वाली नई खबरों पर टिकी हुई हैं।





