कोलकाता/ग्राउंड ब्यूरो — पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय हलचल काफी तेज है। एक तरफ सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस खुद को तकनीकी रूप से मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल भी लगातार रैलियां कर रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के नए और अपग्रेडेड मोबाइल ऐप को जनता के सामने पेश किया है। इस ऐप का मकसद डिजिटल माध्यम से सीधे लोगों से जुड़ना और पार्टी की नीतियों को घर-घर तक पहुंचाना है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में डिजिटल प्रचार चुनाव का एक बड़ा हथियार बनने वाला है।
तृणमूल कांग्रेस के इतिहास पर नजर डालें तो इस पार्टी की नींव एक जनवरी 1998 को रखी गई थी। पार्टी हर साल 21 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में मनाती है, जिसकी शुरुआत 1993 की एक बड़ी राजनीतिक घटना से जुड़ी हुई है। समय के साथ पार्टी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी एक मजबूत पहचान बनाई है। आज के समय में जब हर पार्टी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आगे बढ़ रही है, तब तृणमूल का यह नया ऐप कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एक सूत्र में पिरोने का काम करेगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि इसके जरिए आम जनता अपनी बात सीधे पार्टी तक पहुंचा सकेगी।
सुवेंदु अधिकारी की रैलियां और विपक्ष का आक्रामक रुख
दूसरी ओर, राज्य के मुख्य विपक्षी दल भी चुप नहीं बैठे हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने अदालत से अनुमति लेकर अपनी रैलियों का सिलसिला जारी रखा है। हाल ही में उन्होंने बतौर नेता प्रतिपक्ष अपनी अस्सीवीं रैली करने की तैयारी पूरी कर ली है। विपक्ष का यह लगातार जमीनी दौरा इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में सियासी टकराव और ज्यादा बढ़ने वाला है। विपक्षी नेता लगातार राज्य सरकार की नीतियों और कामकाज के तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं।
जमीनी स्तर पर हालात को देखें तो आम जनता दोनों तरफ की गतिविधियों पर करीबी नजर बनाए हुए है। एक तरफ जहां सत्ताधारी पार्टी आधुनिक तकनीक का सहारा ले रही है, वहीं विपक्ष रैलियों के जरिए भीड़ जुटाकर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है। आम लोगों का मानना है कि इन सियासी मुलाकातों और डिजिटल बदलावों से अंततः चुनावी समीकरण ही प्रभावित होंगे। हर पार्टी अपनी जमीन बचाने और नई जमीन तलाशने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।
डिजिटल तकनीक बनाम पारंपरिक रैलियों की यह लड़ाई
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल अब राजनीतिक दलों की मजबूरी बन गया है। ममता बनर्जी द्वारा लॉन्च किया गया यह नया मोबाइल ऐप कार्यकर्ताओं को पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सीधे जोड़ने का काम करेगा। इसके जरिए पार्टी के दिशा-निर्देश बहुत कम समय में निचले स्तर तक पहुंच सकेंगे। सोशल मीडिया और ऐप्स के इस दौर में जो दल जनता के फोन तक पहुंचेगा, उसे चुनावी मैदान में बढ़त मिलने की पूरी उम्मीद रहती है।
हालांकि, डिजिटल प्रचार के साथ-साथ पारंपरिक रैलियों का महत्व भी कम नहीं हुआ है। सुवेंदु अधिकारी की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ यह साबित करती है कि आज भी सीधी जनसभाएं लोगों से जुड़ने का सबसे बड़ा जरिया हैं। बंगाल की जनता इन दोनों ही राजनीतिक रणनीतियों को बहुत गौर से देख रही है। राज्य का यह सियासी माहौल आने वाले महीनों में और अधिक गरमाने के पूरे आसार हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
द फ्रीलान्स की टीम ने जब कोलकाता और आसपास के इलाकों में पड़ताल की, तो यह साफ हुआ कि सियासी दल जनता का मूड भांपने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। चाहे वह तकनीक का अपग्रेडेशन हो या अदालती अनुमति लेकर रैलियां करना, हर कदम के पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है। आम नागरिक महंगाई और विकास जैसे मुद्दों पर बात करना चाहते हैं, जबकि राजनीतिक दल अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से एजेंडा तय कर रहे हैं। आने वाला समय बताएगा कि इनमें से कौन सी रणनीति जनता के दिलों पर ज्यादा असर छोड़ती है।




