नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। बंबई स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स आज एक हजार अंकों की भारी गिरावट के साथ 71,600 के स्तर पर आ गया। यह लगातार नौवां हफ्ता है जब शेयर बाजार में लगातार बिकवाली का दौर देखने को मिला है। बाजार के जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने निवेशकों का भरोसा कमजोर कर दिया है। बाजार खुलने के साथ ही बिकवाली का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह दिन भर के कारोबार के दौरान और गहराता चला गया।
इस भारी गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल का महंगा होना माना जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल बाहर से खरीदता है। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से देश में आयात बिल बढ़ जाता है और महंगाई का खतरा भी पैदा हो जाता है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है। विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार भारतीय बाजारों से अपना पैसा निकाले जाने से भी हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। छोटे और मझोले निवेशकों में इस बात को लेकर डर बैठ गया है कि बाजार की यह कमजोरी अभी कुछ और दिन और बनी रह सकती है।
मेटल और ऑटो शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली
आज के कारोबार में मेटल और ऑटोमोबाइल सेक्टर के शेयरों की सबसे बुरी हालत रही। टाटा मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाटा स्टील और हिंडाल्को जैसी बड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली देखी गई। वाहन निर्माताओं के शेयरों के गिरने की मुख्य वजह यह है कि कच्चे माल के महंगे होने से कंपनियों की लागत बढ़ गई है। इसके अलावा, गाड़ियों की मांग में सुस्ती आने की आशंका से भी निवेशकों ने अपने हाथ खींच लिए हैं। धातु यानी मेटल सेक्टर पर चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती का साया साफ तौर पर दिखाई दे रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर धातुओं की मांग घट रही है और भारतीय कंपनियों के शेयर भी धड़ाम हो गए हैं।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित वित्तीय बाजारों के आसपास कुछ निवेशकों और दलालों से बात की, तो उनका दर्द साफ झलकता दिखा। पिछले नौ हफ्तों से लगातार गिरते बाजार ने छोटे निवेशकों की गाढ़ी कमाई पर पानी फेर दिया है। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने जिन शेयरों में लंबी अवधि के लिए पैसा लगाया था, वे अब अपनी खरीद मूल्य से भी नीचे आ चुके हैं। बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक मोर्चे पर कोई सकारात्मक खबर नहीं आती या कच्चे तेल की कीमतें नीचे नहीं आतीं, तब तक भारतीय बाजारों में स्थिरता लौटनी मुश्किल नजर आ रही है।
लगातार नौ हफ्तों से गिर रहा बाजार
इतिहास गवाह है कि भारतीय शेयर बाजार में इस तरह लगातार नौ हफ्तों तक लाल निशान में रहना बहुत आम बात नहीं है। यह स्थिति तब बनती है जब एक साथ कई आर्थिक मोर्चों पर मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। घरेलू स्तर पर कंपनियों के तिमाही नतीजे भी बहुत ज्यादा जोश नहीं भर पाए हैं। महंगाई के आंकड़े और रिजर्व बैंक की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता भी बाजार पर हावी है। बैंक और वित्तीय सेवाओं के शेयरों में भी बिकवाली का दबाव साफ तौर पर देखा जा सकता है, जिससे पूरे बाजार का मनोबल गिरा हुआ है।
आम निवेशकों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे इस मुश्किल समय में क्या कदम उठाएं। वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि ऐसे समय में घबराकर अपने शेयर औने-पौने दामों में बेचने से बचना चाहिए। यदि आपके पास अच्छे फंडामेंटल वाली कंपनियों के शेयर हैं, तो लंबी अवधि की दृष्टि से धैर्य रखना ही सबसे बेहतर उपाय साबित हो सकता है। हालांकि, नए निवेशकों को अभी किसी भी तरह का बड़ा दांव लगाने से पहले बाजार की चाल पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले दिनों में बाजार की चाल पूरी तरह से वैश्विक संकेतों और राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों पर ही टिकी रहेगी।
आगे क्या हो सकता है निवेशकों का रुख
बाजार की इस चाल ने साफ कर दिया है कि घरेलू अर्थव्यवस्था भले ही मजबूत बनी हुई हो, लेकिन वैश्विक झटकों से खुद को बचाना आसान नहीं है। पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता आने वाले हफ्तों में भी बाजार की दिशा तय करेगी। जानकारों का मानना है कि जब तक विदेशी संस्थागत निवेशक फिर से खरीदारी शुरू नहीं करते, तब तक बाजार में बड़ी तेजी की उम्मीद करना बेमानी होगा। निवेशकों को इस दौर में अपने पोर्टफोलियो को विविधता देने और सुरक्षित सेक्टरों में निवेश करने की सलाह दी जा रही है ताकि जोखिम को कम किया जा सके।






