नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — प्रशांत महासागर के गर्म पानी ने एक बार फिर पूरी दुनिया के मौसम वैज्ञानिकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कई डिग्री ज्यादा दर्ज किया जा रहा है। मौसम विज्ञान की भाषा में इस मौसमी बदलाव को अल नीनो कहा जाता है। अब यह केवल सामान्य मौसमी चक्र नहीं रहा, बल्कि वैज्ञानिकों के अनुसार यह एक ताकतवर सुपर अल नीनो का रूप ले चुका है। इसका सीधा असर दुनिया भर के तापमान, बारिश और खेती पर पड़ने वाला है। भारत में भी इसका असर सर्दियों के मिजाज और आने वाली गर्मियों पर साफ दिखाई देगा। मौसम केंद्रों से आ रहे आंकड़े बताते हैं कि आने वाले छह महीने बेहद संवेदनशील साबित हो सकते हैं।
अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब प्रशांत महासागर में भूमध्य रेखा के पास समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। गर्म पानी की यह विशाल परत हवाओं के रुख को पूरी तरह बदल देती है। आम दिनों में पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इस वजह से महासागर का गर्म पानी पूर्व की ओर ही ठहर जाता है। जब समुद्र की सतह से भारी मात्रा में भाप और गर्मी वायुमंडल में उठती है, तो पूरी पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। इस बार प्रशांत महासागर में पानी का तापमान सामान्य से करीब 2 से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक आंका गया है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे सामान्य नहीं बल्कि सुपर अल नीनो कह रहे हैं।
प्रशांत महासागर की इस हलचल से मौसम वैज्ञानिक क्यों हैरान हैं?
मौसम वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि समुद्र इतनी तेजी से पहले कभी गर्म नहीं हुआ था। चीन, अमेरिका और यूरोप की मौसम एजेंसियों ने लगातार हाई अलर्ट जारी किए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र का बढ़ता तापमान केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह जमीन पर चलने वाली हवाओं की नमी को पूरी तरह सोख लेगा। जब हवा में नमी नहीं होगी, तो बादल बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी। प्रशांत महासागर के पास स्थित देशों जैसे वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं। वहीं दक्षिण अमेरिका के कुछ तटीय इलाकों में भारी बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। मौसम का यह दोहरा मिजाज पूरी दुनिया के खाद्य उत्पादन को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।
चीन के मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी दी है कि इस बार का अल नीनो ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ सकता है। पिछले कुछ दशकों में 1997 और 2015 में इस तरह का भयानक अल नीनो देखा गया था। उन वर्षों में दुनिया भर में सूखे और आगजनी की भयानक घटनाएं सामने आई थीं। इस बार भी कुछ वैसे ही संकेत मिल रहे हैं। प्रशांत महासागर में ऊर्जा का इतना बड़ा भंडार जमा हो चुका है कि इसे ठंडा होने में कई महीने लगेंगे। इसका मतलब यह है कि साल 2024 और 2025 की पहली छमाही में दुनिया को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है।
भारत के मौसम और खेती-किसानी पर इसका क्या असर पड़ेगा?
भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अल नीनो का असर भारत के मानसून और सर्दियों दोनों पर पड़ता है। पिछले मानसून सत्र में देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई थी। इसके बाद अब सर्दियों के मौसम में भी ठंड का असर कम रहने के संकेत मिले हैं। उत्तर और मध्य भारत के मैदानी इलाकों में रात का तापमान सामान्य से ज्यादा बना हुआ है। यदि जाड़ों में कड़ाके की ठंड नहीं पड़ेगी, तो गेहूं, सरसों और चने की रबी फसलों पर इसका सीधा बुरा असर पड़ेगा। फसलों के दाने समय से पहले पक सकते हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।
खेती के साथ-साथ देश के प्रमुख बांधों में पानी का स्तर भी चिंता का विषय बन रहा है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में जलाशयों का जलस्तर सामान्य से काफी नीचे पहुंच चुका है। अल नीनो के कारण अगर फरवरी और मार्च के महीने से ही तेज गर्मी शुरू हो गई, तो पेयजल संकट और गहरा सकता है। देश के किसान अभी से चिंतित हैं क्योंकि खेतों में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलना मुश्किल हो सकता है। मौसम विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे मौसम के ताजा बुलेटिन को देखकर ही फसलों की बुवाई और सिंचाई का फैसला लें।
भीषण लू और आम जनता की सेहत पर मंडराता गंभीर खतरा
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों और मेडिकल शोधकर्ताओं ने सुपर अल नीनो के कारण भारी मानवीय संकट की आशंका जताई है। कई वैश्विक शोध रिपोर्टों में अनुमान लगाया गया है कि बढ़ती गर्मी और लू के कारण लाखों लोग बीमार पड़ सकते हैं। जब वायुमंडल का तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, तो मानव शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। बुजुर्गों, बच्चों और खुले आसमान के नीचे मजदूरी करने वाले लोगों पर हीट स्ट्रोक का खतरा सबसे ज्यादा होता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और मध्य पूर्व के देशों में गर्मी के दिनों में लू से मौत के मामले तेजी से बढ़ सकते हैं।
अस्पतालों में अभी से लू से निपटने के लिए विशेष वार्ड बनाने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। गर्मी बढ़ने से सिर्फ लू का खतरा ही नहीं होता, बल्कि कई संक्रामक बीमारियां भी फैलती हैं। पीने के पानी की कमी के चलते दूषित जल से होने वाले रोग जैसे डायरिया और पीलिया तेजी से फैल सकते हैं। इसके अलावा तेज गर्मी के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता खराब होगी और सांस के मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों को अभी से हीट एक्शन प्लान लागू कर देना चाहिए।
जल संकट और आगे के महीनों के लिए प्रशासन की तैयारियां
आने वाले महीनों की चुनौतियों को देखते हुए केंद्रीय और राज्य स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। सरकार का मुख्य ध्यान इस समय जलाशयों के पानी को सुरक्षित रखने और गर्मियों के लिए बिजली की मांग पूरी करने पर है। तेज गर्मी में एयर कंडीशनर और पंखों का इस्तेमाल बढ़ जाता है, जिससे बिजली की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाती है। यदि पनबिजली परियोजनाओं में पानी की कमी हुई, तो बिजली संकट भी खड़ा हो सकता है। इसलिए ऊर्जा मंत्रालय ने कोयला आधारित बिजली घरों को पूरी क्षमता से तैयार रहने के निर्देश दिए हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि ग्रामीण इलाकों में पानी की बर्बादी रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। अगर समय रहते नहरों की मरम्मत और भूजल संरक्षण पर काम नहीं किया गया, तो मई और जून के महीने बेहद भारी पड़ सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब मौसमी घटनाएं पहले से ज्यादा उग्र हो रही हैं। सुपर अल नीनो की यह दस्तक प्रकृति की एक कड़ी चेतावनी है। आम लोगों को भी पानी के सही इस्तेमाल और भीषण गर्मी से बचने के लिए अभी से जागरूक होना पड़ेगा।




