कैंसर अनुसंधान में सेंधमारी का बड़ा खुलासा
चिकित्सा विज्ञान और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज से जुड़े शोध पत्रों में बड़े स्तर पर फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। हाल ही में किए गए एक विस्तृत अध्ययन में यह चौंकाने वाला सच उजागर हुआ है कि मेडिकल रिसर्च की दुनिया में 'पेपर मिल' यानी फर्जी शोध तैयार करने वाले गिरोह सक्रिय हैं। ये गिरोह पैसों के लालच में फर्जी आंकड़े और झूठे दावे तैयार करके प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपवा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज और नई दवाओं की खोज के लिए प्रामाणिक शोध का होना सबसे जरूरी है। लेकिन जब शोध पत्र ही फर्जी आंकड़ों के आधार पर तैयार किए जाने लगें, तो पूरी चिकित्सा व्यवस्था और मरीजों की जिंदगी दांव पर लग जाती है। इस ताजा खुलासे ने वैज्ञानिक जगत की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अध्ययन में सामने आए 33 हजार से ज्यादा पेपर्स के आंकड़े
प्रतिष्ठित पत्रिका 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' में प्रकाशित इस अध्ययन के दायरे में कुल 33,159 शोध पत्रों को शामिल किया गया था। जब शोधकर्ताओं ने इन सभी लेखों की गहराई से पड़ताल की, तो उनमें से चार हजार से अधिक लेखों में गंभीर अनियमितताएं और फर्जी उद्धरण पाए गए। इन उद्धरणों का मकसद सिर्फ अपने अकादमिक रिकॉर्ड को मजबूत दिखाना और फर्जी संस्थाओं के जरिए मुनाफा कमाना था।
शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि ये संदिग्ध शोध पत्र कुछ खास मेडिकल पत्रिकाओं में ही अधिक संख्या में छपे थे। इनमें 'जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल एंड क्लिनिकल कैंसर रिसर्च' और 'मॉलिक्यूलर कैंसर' जैसी पत्रिकाएं प्रमुख रूप से शामिल हैं। हालांकि अन्य पत्रिकाओं पर इसका प्रभाव काफी हद तक सीमित रहा, लेकिन मुख्यधारा के कैंसर अनुसंधान में इस तरह की सेंधमारी बेहद चिंताजनक है।
कैसे काम करती है 'पेपर मिल' की यह काली दुनिया?
'पेपर मिल' असल में ऐसी संस्थाएं या गिरोह हैं जो बिना किसी प्रयोगशाला के काम किए, सिर्फ कंप्यूटर और फर्जी आंकड़ों के दम पर रिसर्च पेपर तैयार कर लेते हैं। ये गिरोह शोधकर्ताओं या डॉक्टरों को पैसों के बदले इन फर्जी पत्रों में सह-लेखक के रूप में उनका नाम शामिल करने का लालच देते हैं। इसके बाद वे अपनी पहुंच और जुगाड़ के जरिए इन्हें अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित करवा देते हैं।
अकादमिक दुनिया में तरक्की, फंडिंग और प्रमोशन के लिए शोध पत्रों की संख्या और उनके उद्धरणों को मुख्य पैमाना माना जाता है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ये जालसाज अपने फर्जी शोध पत्रों को दूसरों की तुलना में 50 से 100 प्रतिशत तक अधिक उद्धरण दिला देते हैं। हालांकि सच्चाई यह है कि इन पेपर्स को न तो ऑनलाइन ज्यादा लोग देखते हैं और न ही इनका कोई जमीनी वैज्ञानिक महत्व होता है।
मरीजों की जान पर मंडराता गंभीर खतरा
चिकित्सा क्षेत्र में इस तरह के फर्जीवाड़े का सीधा असर आम मरीजों की जिंदगी पर पड़ता है। जब डॉक्टर और वैज्ञानिक किसी नई दवा या इलाज की प्रभावशीलता जांचने के लिए इन फर्जी शोध पत्रों का हवाला देते हैं, तो पूरी उपचार प्रक्रिया गलत दिशा में जा सकती है। इससे न केवल इलाज का खर्च बढ़ता है, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
"उद्धरणों की संख्या को कृत्रिम रूप से बढ़ाने से वैज्ञानिक साक्ष्यों का पूरा आधार विकृत हो जाता है। इससे भविष्य के शोध और चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली जानकारियों पर से डॉक्टरों का भरोसा उठने लगा है।"— चिकित्सा अनुसंधान विश्लेषक
वैज्ञानिक पत्रिकाओं और संस्थाओं के सामने कड़ी चुनौती
इस बड़े खुलासे के बाद अब दुनिया भर की मेडिकल पत्रिकाओं और शोध संस्थानों पर अपनी पियर-रिव्यू प्रक्रिया को और ज्यादा सख्त बनाने का दबाव बढ़ गया है। जानकारों का कहना है कि जब तक पत्रिकाओं के संपादकीय बोर्ड फर्जी शोध संगठनों की इस कार्यशैली को पकड़ने के लिए सख्त डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल नहीं करेंगे, तब तक इस तरह के मामलों पर रोक लगानामुश्किल होगा।
भारत और दुनिया भर के स्वास्थ्य नियामकों को भी अब यह सुनिश्चित करना होगा कि अकादमिक संस्थानों में केवल उन्हीं शोधों को मान्यता मिले जिनका सत्यापन पूरी पारदर्शिता के साथ हुआ हो। आने वाले समय में यदि इस फर्जीवाड़े पर लगाम नहीं कसी गई, तो मेडिकल साइंस में मानवता के कल्याण के लिए होने वाले ईमानदार प्रयासों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।










