तेहरान की ठंडी हवाओं के बीच एक बार फिर कला, अभिव्यक्ति और सत्ता के टकराव की गूंज सुनाई दे रही है। 'द फ्रीलान्स' के डेस्क पर जब ईरान से यह खबर आई कि एक जाने-माने ईरानी सिंगर को कोड़े मारने की सज़ा को अदालत ने बरकरार रखा है, तो यह सवाल लाजिमी था कि आख़िर उस संगीत कार्यक्रम में ऐसा क्या हुआ था जिसने न्याय व्यवस्था को इतना क्रूर फैसला सुनाने पर मजबूर कर दिया?
कला और कानून की जंग: क्या था वो विवादित कन्सर्ट?
यह मामला एक ऐसे लाइव कन्सर्ट से जुड़ा है जहां संगीत की महफिल सजी थी और दर्शक दीर्घा में युवाओं का उत्साह चरम पर था। लेकिन इस्लामिक गणराज्य ईरान के सख्त सांस्कृतिक कानूनों के दायरे में यह आयोजन जल्द ही एक कानूनी बवंडर में बदल गया। चश्मदीदों और शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, इस परफॉरमेंस के दौरान कथित तौर पर उन नियमों की अनदेखी की गई जो सार्वजनिक मंचों पर संगीत, पोशाक और आचरण के लिए तय किए गए हैं। ईरानी न्यायपालिका ने इसे देश के धार्मिक और कानूनी ढांचे पर सीधा प्रहार माना।
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सज़ा का खौफनाक प्रावधान और मानवाधिकारों की अनदेखी
सार्वजनिक तौर पर शारीरिक दंड यानी कोड़े मारने की सज़ा का प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के निशाने पर हमेशा से रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक कलाकार को उसकी कला या प्रस्तुति के लिए इस तरह की क्रूर और अमानवीय सज़ा देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने के बराबर है। बावजूद इसके, ईरान की उच्च अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलट हीं, बल्कि इसे पूरी तरह वैध ठहराते हुए सज़ा बरकरार रखी है।
सुरक्षा, पहनावा और सार्वजनिक स्पेस पर बढ़ती पाबंदियां
ईरान से लेकर दुनिया भर के महानगरों तक, आज सार्वजनिक स्पेस और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहस छिड़ी हुई है। चाहे वह महिलाओं की सुरक्षा और उनके पहनावे को लेकर हो या फिर कलाकारों की अभिव्यक्ति को लेकर, सत्ता और समाज के बीच की खींचतान बढ़ रही है। हाल ही में वैश्विक मंचों पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां संगीतकारों, लेखकों और अभिनेताओं को वैचारिक असहमति की भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
न्याय और निष्पक्षता पर सवाल: आगे क्या होगा?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संस्थाएं इस मामले में लगातार हस्तक्षेप की मांग कर रही हैं, लेकिन ईरानी प्रशासन अपनी सख्त नीतियों पर कायम है। संगीत और कला जो कभी दिलों को जोड़ने का जरिया हुआ करती थी, आज ईरान में दमन का शिकार हो रही है। 'द फ्रीलान्स' की यह पड़ताल इस बात की गवाही देती है कि जब तक वैचारिक स्वतंत्रता को कुचलने का यह सिलसिला थमेगा नहीं, तब तक ऐसे कन्सर्ट और अदालत के फैसले सुर्खियों में बने रहेंगे।










