मुंबई: भारतीय सिनेमा में ऐसे कलाकार बहुत कम हुए हैं जिन्होंने बिना किसी गॉडफादर या परम्परागत नायक की छवि के केवल अपने अभिनय, आंखों के तेवर और बेजोड़ संवाद अदायगी के दम पर बॉक्स ऑफिस और समालोचकों दोनों को अपना मुरीद बना लिया। नाना पाटेकर उस विरली श्रेणी के शीर्ष कलाकार थे।
थियेटर की भट्टी से तपकर निकले अभिनय के 'क्रांतिवीर'
1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर (जिन्हें दुनिया ने नाना पाटेकर के नाम से जाना) ने अपने करियर की शुरुआत मराठी थियेटर और विज्ञापनों में रेखाचित्र बनाकर की थी। मुजफ्फर अली की फिल्म 'गमन' (1978) से हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाले नाना को 1984 में एन. चंद्रा की फिल्म 'अंकुश' से व्यापक पहचान मिली।
तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से नवाजे गए
नाना पाटेकर ने भारतीय सिनेमा को ऐसे किरदार दिए जो हमेशा के लिए अमर हो गए:
- परिंदा (1989): विधु विनोद चोपड़ा की इस कल्ट क्लासिक फिल्म में 'अन्ना' के नकारात्मक किरदार के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
- क्रांतिवीर (1994): 'ये मुसलमान का खून, ये हिन्दू का खून... बता इसमें कौन सा मुसलमान का, कौन सा हिन्दू का?' जैसे संवादों ने देश के थियेटरों में तहलका मचा दिया। इस फिल्म के लिए नाना को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया।
- अग्नि साक्षी (1996): एक संशयग्रस्त और आक्रामक पति के रोल में बेहतरीन अदाकारी के लिए उन्हें फिर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
- नटसम्राट (2016): महेश मांजरेकर द्वारा निर्देशित इस मराठी फिल्म में अप्पा बेलवलकर के किरदार में नाना का अभिनय विश्व सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में गिना जाता है।
नाना ने गंभीर सिनेमा के अलावा 'वेलकम', 'टैक्सी नंबर 9211' और 'राजनीति' जैसी व्यावसायिक फिल्मों में भी अपनी जबरदस्त मौजूदगी दर्ज कराई।









