औरंगाबाद/पुणे: नाना पाटेकर की शख्सियत की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे फिल्मी चकाचौंध में कभी नहीं बंधे। जब महाराष्ट्र का मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र भीषण सूखे और किसानों की आत्महत्याओं के दर्द से कराह रहा था, तब नाना पाटेकर अपने बंगले से निकलकर सीधे किसानों के आंसुओं के बीच पहुंचे।
2015 में 'नाम फाउंडेशन' की ऐतिहासिक शुरुआत
साल 2015 में नाना पाटेकर और लोकप्रिय मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने मिलकर 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की नींव रखी। नाना ने अपनी जमापूंजी से करोड़ों रुपये का व्यक्तिगत दान दिया और आम नागरिकों से किसानों की मदद के लिए हाथ बढ़ाने की अपील की। जनता ने उनके आह्वान पर दिल खोलकर भरोसा जताया और कुछ ही हफ्तों में करोड़ों रुपये जुटाए गए।
जमीनी स्तर पर किए गए प्रमुख कार्य
- आत्महत्या पीड़ित किसान परिवारों को सहायता: संकटग्रस्त परिवारों की माताओं और बच्चों को मासिक आर्थिक मदद, सिलाई मशीनें और स्वरोजगार के साधन उपलब्ध कराए।
- जल संरक्षण और नदी कायाकल्प: सूखाग्रस्त गांवों में दर्जनों नालों और नदियों की खुदाई करवाकर पानी का संचय सुनिश्चित किया, जिससे सैकड़ों गांवों में भूजल स्तर में अभूतपूर्व सुधार हुआ।
- शहीद जवानों के परिवारों को संबल: सीमा पर देश के लिए जान गंवाने वाले जवानों के परिवारों की आर्थिक और शैक्षिक जिम्मेदारी उठाई।
नाना अक्सर कहते थे— 'किसान जब तक जिंदा है, देश तब तक जिंदा है। अगर अन्नदाता ही रोएगा तो हम रोटी कैसे खाएंगे?' उनका यह समर्पण उन्हें केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि जनता का सच्चा सेवक बनाता है।










