हैदराबाद: भारतीय सिनेमा ने अपने एक सबसे दूरदर्शी और प्रयोगधर्मी फिल्मकार को खो दिया है। 'अपूर्वा सहोदरर्गल' और 'माइकल मदाना कामा राजन्' जैसी मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्मों के निर्देशक सिंगीथम श्रीनिवास राव का 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके निधन से दक्षिण भारतीय सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक शोक की लहर दौड़ गई है। द फ्रीलान्स की ऑन-द-ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, उनके जाने से सिनेमा ने एक ऐसा प्रयोगधर्मी कलाकार खो दिया है जिसने कभी लीक पर चलना पसंद नहीं किया।
सीमाओं से परे सिनेमा: एक अनूठी विरासत
सिंगीथम श्रीनिवास राव केवल एक निर्देशक नहीं थे, बल्कि वे सिनेमाई व्याकरण को नए सिरे से लिखने वाले रचनाकार थे। उन्होंने अपने लंबे करियर में कॉमेडी, ड्रामा, साइंस-फिक्शन और पौराणिक कथाओं जैसे विविध विषयों पर काम किया। बिना संवादों के 'पुष्पक' जैसी मूक फिल्म बनाना हो या कमल हासन को एक साथ तीन अलग-अलग भूमिकाओं में 'अपूर्वा सहोदरर्गल' में ढालना, राव साहब ने हर बार साबित किया कि कला की कोई सीमा नहीं होती।
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जूनियर एनटीआर और फिल्म जगत की श्रद्धांजलि
दिग्गज फिल्ममेकर के निधन की खबर मिलते ही सोशल मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री में शोक की आंधी चल पड़ी। लोकप्रिय अभिनेता जूनियर एनटीआर ने आगे आकर सिंगीथम श्रीनिवास राव की असाधारण विरासत को याद किया। उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा कि राव साहब का योगदान आने वाली पीढ़ियों के फिल्म निर्माताओं को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। इसके अलावा, तमिल और तेलुगु सिनेमा के कई अन्य दिग्गजों ने भी उनके आवास पर पहुंचकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
भारतीय सिनेमा में एक युग का अंत
95 वर्ष की लंबी आयु जीने वाले सिंगीथम श्रीनिवास राव ने सिनेमा को वह सब कुछ दिया, जिसकी एक सच्चे कला प्रेमी को तलाश होती है। उनकी फिल्मों में तकनीकी बारीकियों के साथ-साथ मानवीय भावनाओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता था। 'आदित्य 369' जैसी पहली तेलुगु साइंस-फिक्शन फिल्म बनाकर उन्होंने बहुत पहले ही यह दिखा दिया था कि भारतीय सिनेमा तकनीक के मामले में किसी से पीछे नहीं है।
भविष्य पर प्रभाव और सिनेमाई सबक
आज जब मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर व्यावसायिक गणित में उलझ जाता है, सिंगीथम श्रीनिवास राव का जीवन और कार्य नए निर्देशकों के लिए एक मार्गदर्शिका की तरह है। वे सिखाते हैं कि जोखिम लेना और लीक से हटकर सोचना ही कला को अमर बनाता है। 'द फ्रीलान्स' की इस विशेष पड़ताल से यह स्पष्ट है कि भले ही राव साहब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनका सिनेमाई दर्शन हमेशा जीवंत रहेगा।








