नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — सोशल मीडिया की दुनिया में मचे भूचाल और फेसबुक के अंदरूनी मामलों पर बनी बहुप्रतीक्षित फिल्म 'द सोशल रेकनिंग' अब रिलीज के बेहद करीब है। यह फिल्म 9 अक्टूबर को सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है। इस फिल्म की कहानी फेसबुक के पूर्व व्हिसलब्लोअर द्वारा किए गए बड़े खुलासों और कंपनी के कामकाज के तौर-तरीकों के इर्द-गिर्द घूमती है। निर्देशक एरोन सॉर्किन ने इस प्रोजेक्ट के जरिए एक बार फिर तकनीक जगत की अंदरूनी सच्चिाइयों को बड़े पर्दे पर उतारने की कोशिश की है।
फिल्म के आने से पहले ही तकनीकी गलियारों और मीडिया में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। द गार्जियन और बीबीसी जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों ने इस फिल्म की समीक्षाएं प्रकाशित कर दी हैं। समीक्षाओं में इसे फेसबुक और मार्क जुकरबर्ग की कार्यशैली पर एक तीखा प्रहार बताया गया है। फिल्म में मार्क जुकरबर्ग के किरदार को और उनके फैसलों को काफी करीब से दिखाने का दावा किया गया है। इससे पहले भी जुकरबर्ग पर कई फिल्में और डॉक्यूड्रामा बन चुके हैं, लेकिन इस बार का नजरिया पूरी तरह अलग बताया जा रहा है।
मार्क जुकरबर्ग की भूमिका और नए खुलासे
फिल्म के ट्रेलर और समीक्षाओं से यह साफ हो गया है कि इसमें मार्क जुकरबर्ग के किरदार को एक अलग ही अंदाज में पेश किया गया है। आलोचकों का कहना है कि यह फिल्म फेसबुक के उन काले सच को सामने लाती है, जिन्हें आम तौर पर पर्दे के पीछे छिपाकर रखा जाता है। व्हिसलब्लोअर के बयानों और दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई यह पटकथा दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आज के समय में सोशल मीडिया कंपनियां हमारे जीवन को कितना प्रभावित कर रही हैं।
दर्शकों और फिल्म प्रेमियों के बीच इस बात को लेकर भी बहस छिड़ गई है कि क्या यह फिल्म असल जिंदगी के हालातों को पूरी ईमानदारी से दिखा पाती है या नहीं। बीबीसी की समीक्षा के अनुसार, यह ड्रामा फेसबुक को कटघरे में खड़ा तो करता है, लेकिन यह हर किसी की सोच को रातों-रात बदलने में कामयाब नहीं होगा। इसके बावजूद, फिल्म को लेकर आम जनता और तकनीक प्रेमियों में गजब का उत्साह देखा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में फिल्म को मिल रही मिली-जुली प्रतिक्रिया
द गार्जियन ने अपनी समीक्षा में इसे एरोन सॉर्किन का एक और तीखा नाटक बताया है, जिसमें आधुनिक समय की तकनीकी ताकतों पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, कुछ समीक्षकों का मानना है कि फिल्म की कहानी थोड़ी उलझन भरी हो सकती है, जिसे आम दर्शक समझने में थोड़ा समय ले सकते हैं। इसके बावजूद, फेसबुक जैसी दिग्गज कंपनी के अंदर चल रहे सत्ता के खेल को पर्दे पर देखना अपने आप में एक बड़ा अनुभव माना जा रहा है।
भारत में भी तकनीकी और सिनेमा प्रेमी इस फिल्म की रिलीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव के बीच यह फिल्म एक बड़ा संदेश देने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म दर्शकों को कितना लुभा पाती है और टेक जगत पर इसका क्या असर पड़ता है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
हमारी टीम की पड़ताल के मुताबिक, 'द सोशल रेकनिंग' केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह आज के डिजिटल युग में डेटा और निजता की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान है। फिल्म रिलीज होने के बाद यह देखना अहम होगा कि क्या फेसबुक या मेटा की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें 9 अक्टूबर पर टिकी हैं, जब यह फिल्म आधिकारिक तौर पर पर्दे पर आएगी।









