अमेरिका में मिडटर्म चुनाव की सरगर्मी और ट्रंप का आक्रामक प्रचार अभियान
अमेरिकी राजनीति में इस समय हलचल अपने चरम पर है। देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी मध्यावधि चुनावों यानी मिडटर्म इलेक्शन को लेकर पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहे हैं। वाशिंगटन से लेकर जॉर्जिया और एरिजोना तक, ट्रंप ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं। उनका यह अभियान केवल रिपब्लिकन पार्टी की सीटों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके बचे हुए कार्यकाल के एजेंडे को सुरक्षित रखने की एक बड़ी सियासी जंग बन चुका है।
जॉर्जिया के डाल्टन में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी इतिहास के इस दौर को बेहद नाजुक बताया। उन्होंने समर्थकों से आह्वान किया कि वे इस चुनाव को बेहद गंभीरता से लें और मतदान केंद्रों तक पहुंचें। ट्रंप ने अपने भाषण में साफ शब्दों में कहा कि मतदाताओं को ऐसा महसूस करना चाहिए मानो इस चुनाव में खुद डोनाल्ड ट्रंप ही बैलेट पेपर पर उम्मीदवार के रूप में खड़े हों।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी इतिहास में मिडटर्म चुनावों के दौरान अमूमन सत्ताधारी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। यही वजह है कि ट्रंप खुद मैदान में उतरकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि यदि इस चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी ने संसद के दोनों सदनों पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं रखी, तो आने वाले समय में राष्ट्रपति के लिए किसी भी नीति को पास कराना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
संसद के दोनों सदनों पर टिकी निगाहें और कांग्रेस का गणित
अमेरिका में हर चार साल पर राष्ट्रपति पद के चुनाव होते हैं, लेकिन इन चुनावों के ठीक दो साल बाद मिडटर्म चुनाव कराए जाते हैं। इस चुनाव में अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों और ऊपरी सदन सीनेट की 35 सीटों के लिए जनता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करती है। इसके साथ ही कई राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनावी मुकाबला देखने को मिलता है।
फिलहाल अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी को निचले सदन में बहुमत हासिल करने के लिए केवल कुछ ही सीटों की दरकार है। यदि विपक्षी दल डेमोक्रेट्स इनमें से किसी भी एक सदन पर कब्जा जमाने में कामयाब हो जाते हैं, तो ट्रंप प्रशासन के लिए नए कानूनों को अमलीजामा पहनाना लगभग असंभव सा हो जाएगा। यही कारण है कि व्हाइट हाउस इन चुनावों को लेकर किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है।
"यह शायद हमारे देश के इतिहास का सबसे अहम मिडटर्म चुनाव है। हमने पिछले कुछ सालों में जो ऐतिहासिक काम किए हैं, उन्हें हम यूं ही छिनने नहीं दे सकते। अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए संसद में हमारा मजबूत होना बेहद जरूरी है।" — डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति
आर्थिक मोर्चे पर बड़े दावे और 'ट्रंप डिविडेंड' का सियासी शिगूफा
चुनावी सभाओं के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति को बेहतरीन बताते हुए कई बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि देश में बेरोजगारी दर ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है और व्यक्तिगत आय में भी जबरदस्त इजाफा हुआ है। ट्रंप ने देश भर में नई फैक्ट्रियों के निर्माण और ऑटो व फार्मा सेक्टर में हो रहे भारी निवेश को अपनी सरकार की बड़ी सफलता के रूप में गिनाया।
इसी बीच, अलास्का की एक रैली में ट्रंप ने एक ऐसा ऐलान किया जिसने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी। उन्होंने वादा किया कि यदि रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस के दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण बरकरार रखती है, तो आयात शुल्क यानी टैरिफ से होने वाली कमाई के जरिए देश के हर बालिग नागरिक को 5,000 डॉलर की राशि दी जाएगी। उन्होंने इसे 'ट्रंप डिविडेंड' का नाम दिया, जिसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के भीतर ही खर्च किया जाना है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि इस तरह के किसी भी वित्तीय फैसले के लिए अमेरिकी कांग्रेस की आधिकारिक मंजूरी लेनी अनिवार्य होगी।
ईरान संकट, महंगाई और अप्रवासन के मुद्दे हावी
इस बार के मिडटर्म चुनावों में आम जनता के सामने कई गंभीर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे मुड़े हुए हैं। देश में बढ़ती महंगाई और ईरान के साथ चल रहे तनाव का सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है। इसके अलावा, सीमा सुरक्षा और अवैध अप्रवासन (Immigration) का मुद्दा भी रिपब्लिकन पार्टी के एजेंडे में सबसे ऊपर है।
विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिले हैं कि कई इलाकों में मतदाताओं का रुख बंटा हुआ है। महंगाई से परेशान आम जनता की नाराजगी का सामना ट्रंप प्रशासन को भी करना पड़ रहा है। ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की फिराक में है। एरिजोना और मोंटाना जैसे राज्यों में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है, जहां ट्रंप खुद रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में रैलियां कर रहे हैं ताकि पार्टी के पाले में वोटों का झुकाव सुनिश्चित किया जा सके।
भारत और वैश्विक कूटनीति के लिए क्यों अहम हैं ये नतीजे
इन अमेरिकी चुनावों का असर केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत और दुनिया के कई अन्य देशों पर भी पड़ेगा। अमेरिका में आव्रजन नीतियों, विशेषकर H-1B वीजा नियमों और आईटी प्रोफेशनल्स से जुड़े फैसलों पर इन चुनावों के नतीजे गहरी छाप छोड़ सकते हैं। भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक भी बड़ी संख्या में वहां रहते हैं, जिनकी निगाहें इन चुनावों के परिणामों पर टिकी हुई हैं।
इसके अलावा, वाशिंगटन की विदेश नीति और वैश्विक व्यापार समझौतों का भविष्य भी काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि आगामी 3 नवंबर को आने वाले चुनाव परिणाम अमेरिकी संसद की तस्वीर क्या तय करते हैं। दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि यदि अमेरिकी संसद में सत्ता का संतुलन बदलता है, तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।










