विदेश जाकर बसना और वहां एक नई जिंदगी शुरू करना लाखों युवाओं का सपना होता है। बेहतर करियर, आधुनिक सुविधाएं और एक अलग जीवनशैली की चाहत लोगों को सात समंदर पार खींच ले जाती है। शुरुआत में यह सब बेहद रोमांचक और जादुई महसूस होता है, लेकिन क्या यह उत्साह हमेशा बना रहता है? सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने इसी सवाल पर गहरी बहस छेड़ दी है, जिसमें एक भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने अनुभवों को साझा किया है।
माइक्रोसॉफ्ट में कार्यरत सॉफ्टवेयर इंजीनियर आयुषी श्रीवास्तव ने अपने हालिया इंस्टाग्राम वीडियो में अमेरिका में रहने के अपने दो साल के सफर का जिक्र किया। बिट्स पिलानी की पूर्व छात्र रहीं आयुषी जब कम उम्र में विदेश गईं, तो उनके मन में भी वहां की चकाचौंध को लेकर भारी उत्साह था। लेकिन समय बीतने के साथ उनकी यह शुरुआती एक्साइटमेंट अब फीकी पड़ने लगी है और उन्हें सब कुछ सामान्य लगने लगा है।
'अब ये सब नॉर्मल लगता है'
वीडियो में आयुषी ने वहां के खूबसूरत वॉटरफ्रंट का नजारा दिखाते हुए बताया कि अब वह उन तमाम चीजों की आदी हो चुकी हैं, जो कभी उन्हें बेहद खास लगती थीं। बड़ी-बड़ी इमारतें, साफ हवा, और मौसम के बदलते रंग अब उन्हें असाधारण नहीं लगते। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जिंदगी का एक बड़ा सपना पूरा हो जाता है और उसकी चमक भी सामान्य लगने लगती है, तो आगे बढ़ने के लिए नई प्रेरणा या लक्ष्य क्या होना चाहिए?
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मनोविज्ञान क्या कहता है: 'हेडोनिक अडैप्टेशन'
आयुषी के इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कई यूजर्स ने इसे 'हेडोनिक अडैप्टेशन' करार दिया। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी नए बदलाव, सफलता या उपलब्धि से मिलने वाली भावनात्मक खुशी समय के साथ कम होने लगती है और इंसान का मन वापस अपनी सामान्य स्थिति में लौट आता है। यह नियम केवल विदेश जाने पर ही लागू नहीं होता, बल्कि एक नई नौकरी, बड़ी सैलरी या महंगी कार खरीदने के बाद भी इंसानी स्वभाव ऐसा ही बर्ताव करता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल इस वीडियो के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो साभार: संबंधित सोशल मीडिया हैंडल / क्रिएटर।





