नई दिल्ली से 'द फ्रीलांस' की ऑन-द-ग्राउंड विशेष रिपोर्ट। क्या आप भी उन 84% भारतीयों में शामिल हैं, जो आँख खुलते ही सबसे पहले अपना स्मार्टफोन टटोलने लगते हैं? 'ग्लांस डिजिटल कंज्यूमर सर्वे' 2024 का यह आंकड़ा चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक कड़वा सच बन चुका है। सुबह की शांत हवा और सकारात्मकता के बजाय हमारी हथेलियों में नीली स्क्रीन की चमक होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिस्तर छोड़ते ही फोन नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और ईमेल की दुनिया में उतर जाना आपके शरीर और खासकर आपके दिमाग पर क्या असर डाल रहा है?
इस गंभीर विषय पर पड़ताल करने के लिए 'द फ्रीलांस' ने मेट्रो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स, नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. पूजा कुशवाह से विस्तार से बातचीत की। उन्होंने बताया कि सुबह जागने के तुरंत बाद हमारा शरीर और मस्तिष्क कई जटिल बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं से गुजरता है। नींद से जागने के बाद का यह शुरुआती दौर 'स्लीप इनर्शिया' (Sleep Inertia) कहलाता है, जो कुछ मिनटों से लेकर एक घंटे तक रह सकता है। इस दौरान हमारा ब्रेन पूरी तरह एक्टिव नहीं होता और उसका प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (जो तर्क, निर्णय लेने और योजना बनाने के लिए जिम्मेदार है) सुस्त अवस्था में होता है। ऐसे नाजुक वक्त में फोन स्क्रीन पर उमड़ती जानकारियों का सैलाब दिमाग पर भारी दबाव डालता है।
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स्लीप इनर्शिया और डिजिटल ओवरलोड का घातक मेल
- स्लीप इनर्शिया का संक्रमण: जागने के तुरंत बाद फोन देखने से 'स्लीप इनर्शिया' टूटता नहीं बल्कि और उलझ जाता है, जिससे दिनभर सुस्ती और थकान बनी रहती है।
- अटेंशन स्विचिंग (ध्यान भटकाव): एक साथ कई नोटिफिकेशंस देखने से दिमाग का ध्यान बार-बार एक विषय से दूसरे विषय पर कूदता है, जिससे गहराई से सोचने की क्षमता खत्म होने लगती है।
- डोपामिन का जाल और इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन: सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स, रील्स और मेसेज ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम को कृत्रिम रूप से उत्तेजित करते हैं, जिससे पढ़ाई या दफ्तर के जरूरी कामों में मन लगाना दूभर हो जाता है।
हमारी यह पड़ताल यहीं खत्म नहीं होती। डॉ. पूजा कुशवाह चेतावनी देती हैं कि सुबह का पहला इमोशनल रिस्पॉन्स तय करता है कि पूरा दिन कैसा बीतेगा। अगर सुबह-सुबह किसी तनावपूर्ण ईमेल या नकारात्मक खबर पर नजर पड़ जाए, तो 'मॉर्निंग एंग्जाइटी' यानी सुबह की घबराहट और एंग्जाइटी ट्रिगर हो जाती है। इसके अलावा, लगातार कम सोने से शरीर में 'स्लीप डेप्ट' (नींद का कर्ज) जमा होता जाता है, जो मानसिक और शारीरिक सेहत की जड़ों को खोखला कर रहा है। 'द फ्रीलांस' की पाठकों से यही अपील है कि अपने दिन की शुरुआत स्क्रीन की नीली रोशनी से नहीं, बल्कि अपनों के साथ और आत्मिक शांति के साथ करें।




