संक्रामक बीमारियों के खिलाफ लड़ाई में तकनीकी का दखल अब और भी ज्यादा गहरा होने जा रहा है। देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा तरीका विकसित करने का दावा किया है, जिसकी मदद से खतरनाक मंकीपॉक्स यानी एमपाक्स के नए और तेजी से फैलने वाले स्वरूप पर पैनी नजर रखी जा सकेगी। स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की उपयोगिता को लेकर हुए एक ताजा अध्ययन में यह बात सामने आई है कि एआई की मदद से किसी भी महामारी के फैलने से पहले ही उसके संभावित केंद्रों या हॉटस्पॉट का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। यह तकनीक स्वास्थ्य विभागों को पहले से ही सतर्क करने में बेहद कारगर साबित हो सकती है।
एम्स गोरखपुर, दिल्ली फार्मास्यूटिकल साइंसेज एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी यानी डीपीएसआरयू और नोएडा स्थित जेएसएस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से यह शोध कार्य पूरा किया है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'फ्रंटियर्स इन फार्माकोलॉजी' में प्रकाशित किया गया है। शोध पत्र का शीर्षक 'द इमर्जिंग रोल ऑफ एआई इन मैनेजिंग एमपाक्स क्लेड 1बी आउटब्रेक' रखा गया है। इस रिसर्च में मुख्य तौर पर एमपाक्स के क्लेड-1बी स्ट्रेन की पहचान, निगरानी और उसके रोकथाम में डिजिटल और तकनीकी साधनों की भूमिका का गहराई से विश्लेषण किया गया है।
एमपाक्स के क्लेड-1बी वेरिएंट पर वैज्ञानिकों की कड़ी नजर
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, एमपाक्स का क्लेड-1बी वेरिएंट पिछले कुछ समय से वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि यह वायरस अन्य पुराने रूपों की तुलना में काफी तेजी से फैलता है और संक्रमित व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार कर सकता है। ऐसे में पारंपरिक मेडिकल निगरानी व्यवस्थाएं कई बार समय पर स्थिति को भांपने में धीमी साबित हो सकती हैं। इसी कमी को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एल्गोरिदम को जोड़ने की वकालत की है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जब किसी महामारी का प्रकोप शुरू होता है, तो शुरुआती आंकड़े बिखरे हुए होते हैं जिन्हें इंसान की सामान्य समझ से तुरंत जोड़ना मुश्किल होता है। यहीं पर डिजिटल तकनीक और एआई अपनी असली ताकत दिखाते हैं। यह तकनीक पल भर में हजारों डेटा पॉइंट्स को खंगालकर ऐसे पैटर्न ढूंढ निकालती है जो सामान्य नजरों से छिप जाते हैं।
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कैसे काम करेगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित यह मॉडल?
शोधकर्ताओं द्वारा सुझाए गए इस एआई मॉडल की कार्यप्रणाली बेहद आधुनिक और बहुआयामी है। यह प्रणाली केवल एक आंकड़े पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि कई अलग-अलग मोर्चों से मिलने वाले स्वास्थ्य संबंधी इनपुट का एक साथ विश्लेषण करती है। इसमें मरीजों के शारीरिक लक्षण, उनकी लैब जांच रिपोर्ट, उनका हालिया यात्रा इतिहास और क्षेत्रवार संक्रमण के आंकड़ों को एक केंद्रीय पूल में परखा जाता है।
इन सभी जटिल आंकड़ों का रियल-टाइम विश्लेषण करके यह सॉफ्टवेयर उन खास इलाकों या इलाकों के समूहों को चिन्हित कर लेता है जहां संक्रमण के बेकाबू होने का सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा होता है। संभावित हॉटस्पॉट की समय रहते पहचान हो जाने से स्थानीय स्वास्थ्य प्रशासन और सरकारों के पास उस क्षेत्र विशेष में तुरंत पाबंदियां, जांच अभियान और जन-जागरूकता बढ़ाने का पर्याप्त समय मिल जाता है।
"एआई आधारित मॉडल पारंपरिक निगरानी प्रणालियों को पूरी तरह से बदलने के लिए नहीं हैं, बल्कि यह चिकित्सा और प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक मजबूत और दूरदर्शी बनाने का एक अत्यंत प्रभावी तकनीकी माध्यम हैं। इसके जरिए महामारी के खिलाफ हमारी प्रतिक्रिया का समय काफी कम किया जा सकता है।" — शोध दल, एम्स गोरखपुर और सह-संस्थान
सिर्फ मरीजों की पहचान नहीं, अस्पतालों की तैयारी में भी मददगार
इस अध्ययन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एआई का दायरा केवल बीमार लोगों को ढूंढने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने रेखांकित किया है कि यह तकनीक स्वास्थ्य ढांचे के संपूर्ण प्रबंधन में क्रांति ला सकती है। जब किसी खास इलाके में संक्रमण के अचानक तेजी से फैलने के शुरुआती संकेत मिलते हैं, तो यह सिस्टम अस्पताल प्रबंधन को पहले से सचेत कर देता है।
इससे अस्पतालों को यह अनुमान लगाने में मदद मिलती है कि आने वाले दिनों में उन्हें कितने अतिरिक्त आइसोलेशन बेड, ऑक्सीजन सिलेंडर, जीवन रक्षक दवाएं और टेस्टिंग किट की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा, डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती का सही संतुलन बनाने में भी यह तकनीक मार्गदर्शन कर सकती है। इस तरह अस्पताल किसी भी अप्रत्याशित स्वास्थ्य संकट के समय संसाधनों की भारी किल्लत से बच सकते हैं।
डेटा की शुद्धता और मरीजों की गोपनीयता सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि शोधकर्ताओं ने एआई के अनगिनत फायदों का जिक्र किया है, वहीं इसके इस्तेमाल के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर भी खुलकर बात की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी एआई मॉडल की सफलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि उसे इनपुट के रूप में मिलने वाले आंकड़े कितने प्रामाणिक और गुणवत्तापूर्ण हैं। गलत या अधूरे आंकड़े गलत पूर्वानुमान का कारण बन सकते हैं।
इसके साथ ही, सबसे अहम पहलू मरीजों की व्यक्तिगत स्वास्थ्य जानकारी की गोपनीयता और डेटा सुरक्षा का है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वास्थ्य से जुड़े संवेदनशील डेटा को प्रोसेस करते समय यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा कि किसी भी नागरिक की निजी जानकारी लीक न हो। तकनीक और मानवीय नैतिकता के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाकर ही इस व्यवस्था को धरातल पर पूरी तरह से सफल बनाया जा सकता है।







