बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट और छात्रों का बढ़ता आक्रोश
देश के भविष्य यानी युवाओं और विद्यार्थियों के सामने आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार की उपलब्धता को लेकर बनी हुई है। खासकर बिहार राज्य की बात करें, तो यहां के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की शैक्षणिक पटरियां लंबे समय से उखड़ी हुई हैं। छात्र-छात्राओं को समय पर डिग्री नहीं मिल पा रही है, जिससे उनके करियर पर तलवार लटकी रहती है। इसी गंभीर विषय को केंद्र में रखते हुए ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी आइसा ने राज्य स्तर पर एक व्यापक आंदोलन की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है।
हाल ही में हुई सांगठनिक बैठकों के दौरान यह बात खुलकर सामने आई कि राज्य के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में अकादमिक कैलेंडर पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। परीक्षाएं समय पर आयोजित नहीं होतीं और यदि परीक्षाएं हो भी जाती हैं, तो परिणामों के प्रकाशन में महीनों या सालभर की देरी आम बात हो गई है। इन तमाम मुद्दों को लेकर विद्यार्थियों में गहरी निराशा है, जिसे अब संगठित आवाज देने का प्रयास किया जा रहा है।
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राज्य परिषद की बैठक में जुटेंगे देश भर के छात्र नेता
शैक्षणिक बदहाली के खिलाफ चल रहे संघर्ष को और अधिक धार देने के उद्देश्य से एक बड़े सम्मेलन का आयोजन तय किया गया है। इस महामंथन में शिरकत करने के लिए संगठन के शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व को आमंत्रित किया गया है। इस उच्च स्तरीय बैठक में संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा और राष्ट्रीय महासचिव प्रेसनजीत विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। उनके साथ-साथ बिहार के कोने-कोने से विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर के सैकड़ों छात्र प्रतिनिधि इस महासम्मेलन का हिस्सा बनेंगे।
आयोजकों का मानना है कि जब तक युवा अपनी आवाज को सामूहिक रूप से बुलंद नहीं करेंगे, तब तक व्यवस्था के कानों तक जूं नहीं रेंगेगी। इस दो दिवसीय मंथन शिविर में राज्य के तमाम जिलों से आने वाले छात्र नेता अपने-अपने संस्थानों की जमीनी हकीकत साझा करेंगे। साथ ही, स्थानीय स्तर पर आ रही प्रशासनिक अड़चनों और विद्यार्थियों की समस्याओं को मंच पर प्रमुखता से रखा जाएगा, ताकि एक ठोस कार्ययोजना बनाई जा सके।
विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की भारी कमी और मनमाने नियम
बैठकों में उठने वाले मुख्य मुद्दों में सबसे ऊपर परिसरों में शिक्षकों का भारी अभाव है। आज स्थिति यह है कि विश्वविद्यालयों के कई महत्वपूर्ण विभागों में नियमित प्रोफेसर ही नहीं बचे हैं। अतिथि शिक्षकों के भरोसे उच्च शिक्षा की गाड़ी चलाई जा रही है, जिससे पठन-पाठन का स्तर लगातार गिर रहा है। इसके अलावा, छात्रों पर आर्थिक बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
"उच्च शिक्षा के नाम पर युवाओं से मनमानी फीस वसूली जा रही है, जबकि बुनियादी सुविधाएं गायब हैं। चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम लागू तो कर दिया गया, लेकिन उसके अनुरूप संसाधन और आधारभूत ढांचा विकसित नहीं किया गया। यह सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।" — अनीश कुशवाहा, जिला सचिव, आइसा
छात्र नेताओं का आरोप है कि सरकारी तंत्र उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के बजाय निजी संस्थानों और विश्वविद्यालयों को परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने की नीति पर काम कर रहा है। गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों से आने वाले होनहार छात्र भारी-भरकम फीस देने में असमर्थ हैं, जिसके कारण उन्हें उच्च शिक्षा से वंचित होना पड़ रहा है।
रोजगार के मोर्चे पर फैलती निराशा और युवाओं की छटपटाहट
केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि रोजगार का सवाल भी आज के युवाओं के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। डिग्री पूरी होने के बाद भी युवाओं के हाथ खाली रह जाते हैं। राज्य में न तो पर्याप्त सरकारी रिक्तियां भरी जा रही हैं और न ही निजी क्षेत्र में रोजगार के सुरक्षित अवसर सृजित हो रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं और भर्ती प्रक्रियाओं में अंतहीन देरी ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाला है।
आगामी राज्य परिषद के सम्मेलन में इन तमाम ज्वलंत मुद्दों पर विस्तार से विमर्श किया जाएगा। केवल भाषणबाजी तक सीमित रहने के बजाय, सरकार पर दबाव बनाने के लिए सिलसिलेवार आंदोलन के कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। इसमें धरना-प्रदर्शन, विश्वविद्यालयों का घेराव और शैक्षणिक हड़ताल जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।
आगे की राह: सड़कों पर उतरेगा छात्र आंदोलन
बदलते दौर में छात्रों के अधिकार सुरक्षित रखने के लिए नए सिरे से वैचारिक और व्यावहारिक संघर्ष की जरूरत महसूस की जा रही है। संगठन के अन्य प्रमुख पदाधिकारियों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण के खिलाफ छात्र वर्ग आर-पार की लड़ाई का ऐलान करे। सत्र नियमित करने, शिक्षकों के रिक्त पद तत्काल भरने और फीस नियंत्रण कानून लागू करने जैसी मांगों को लेकर पूरे राज्य में एक व्यापक जन-जागਰूकता अभियान चलाया जाएगा।
कुल मिलाकर, आगामी दिनों में होने जा रहा यह छात्र सम्मेलन बिहार की सियासत और शैक्षणिक गलियारों में एक नई हलचल पैदा करने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन छात्र संगठनों के तीखे तेवरों और जायज मांगों पर क्या रुख अपनाती है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में युवा सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज को और अधिक मुखर करने वाले हैं।







