रेंगकर तय किया मुंबई की गलियों का सफर, 34 साल बाद मिला मुकाम
मनोरंजन जगत की रंगीन दुनिया बाहर से जितनी चमकदार और आकर्षक दिखाई देती है, उसके पीछे का सच उतना ही काटों भरा और संघर्षों से पटा होता है। इस बात की तस्दीक खुद जाने-माने अभिनेता और राजनेता रवि किशन ने एक हालिया कार्यक्रम के दौरान की। उन्होंने अपने तीन दशकों से ज्यादा लंबे फिल्मी सफर को याद करते हुए बताया कि शुरुआती दिनों में उन्हें किस कदर पापड़ बेलने पड़े थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह मायानगरी में किसी भव्य सवारी पर सवार होकर नहीं आए थे, बल्कि उन्होंने हर कदम रेंग-रेंग कर और अनगिनत ठोकरें खाकर आगे बढ़ाया था।
उनके अभिनय की शुरुआत किसी बड़े बैनर या शानदार स्टूडियो से नहीं हुई थी, बल्कि रामलीला के मंच से सीता का किरदार निभाकर उन्होंने अभिनय की एबीसीडी सीखी थी। उस छोटे से मंच से लेकर मुंबई की अनगिनत गलियों और स्टूडियो के चक्कर काटने तक का सफर बेहद कांटेदार रहा। उस दौर के कई समकालीन कलाकार जैसे अक्षय कुमार और अजय देवगन नब्बे के दशक में ही अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए थे और आसमान की बुलंदियों को छूने लगे थे। लेकिन रवि किशन के हिस्से में केवल लंबा इंतजार आया, जिसे उन्होंने धैर्य के साथ काटा।
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समय की चाल और बड़े सितारों के बीच अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद
फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री पाना आसान हो सकता है, लेकिन वहां टिके रहना और अपनी एक अलग पहचान बनाना सबसे कठिन परीक्षा होती है। रवि किशन ने इस बात पर रोशनी डाली कि कैसे हर कलाकार को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि उनके समकालीन अभिनेता तेजी से आगे निकल गए, जबकि उन्हें अपनी पारी शुरू करने के लिए कई साल कतार में खड़ा रहना पड़ा। यह इंतजार कुल मिलाकर चौतीस साल लंबा खिंच गया, लेकिन उन्होंने कभी भी हिम्मत नहीं हारी और अपने लक्ष्य से भटके नहीं।
जब उनसे पूछा गया कि इस लंबे और कठिन दौर में उन्होंने खुद को कैसे संभाला, तो उनका सीधा जवाब था कि वक्त से ताकतवर इस दुनिया में कोई नहीं होता। जब सही वक्त आता है, तो इंसान को उसकी मेहनत का फल अवश्य मिलता है। उन्होंने अपने पिता और अपने आध्यात्मिक गुरु पंडित श्याम नारायण शुक्ल को याद करते हुए कहा कि उनके संस्कारों ने ही उन्हें कभी टूटने नहीं दिया। आज जब वे दर्शकों के बीच अपनी एक अलग जगह बना चुके हैं, तो उन्हें इस बात का संतोष है कि उनका संघर्ष व्यर्थ नहीं गया।
किरदार को जीना पड़ता है, स्क्रीन पर नकल करने से बात नहीं बनती
आज के दौर में कई नए कलाकार दूसरों की फिल्मों को देखकर उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन रवि किशन इस लीक से बिल्कुल हटकर सोचते हैं। उनका मानना है कि कैमरे के सामने कोई भी किरदार निभाने के लिए उसे सिर्फ याद करना काफी नहीं होता, बल्कि उस पात्र के भीतर उतरकर उसकी सांसों को महसूस करना पड़ता है। इसके लिए उन्हें कई बार बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा है, चाहे वह चिलचिलाती धूप हो, कड़ाके की ठंड हो या फिर कृत्रिम बारिश के बीच घंटों भीगना हो।
अपने अभिनय के स्रोत के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि वह किसी दूसरी फिल्म से प्रेरणा लेने के बजाय अपने आसपास के माहौल से सीखते हैं। उनका दिमाग गांवों की पगडंडियों, बाजारों की भीड़, चौपालों और आम इंसानों की दिनचर्या से पात्रों को चुनता है। समाज का हर आम आदमी उनके लिए एक चलती-फिरती पाठशाला है। जब कोई खास चाल-ढाल या अंदाज उनके जेहन में बैठ जाता है, तो कैमरे के सामने आते ही वह चरित्र अपने आप जीवंत हो उठता है।
कमजोर लेखन को छिपाने के लिए गालियों का होता है इस्तेमाल
वर्तमान समय में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और वेब सीरीज पर जिस तरह बेहिसाब गालियों और आपत्तिजनक भाषा का चलन बढ़ गया है, उस पर रवि किशन ने बहुत बेबाक और कड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि जब किसी पटकथा में दम नहीं होता और कहानी कहने का हुनर कमजोर पड़ जाता है, तो उस खालीपन को भरने के लिए जानबूझकर फूहड़ता और गालियों का सहारा लिया जाता है। असली और दमदार लेखक को भाषा की ऐसी अमर्यादित बैसाखियों की कभी जरूरत नहीं पड़ती।
"सिनेमा समाज का सबसे शक्तिशाली आईना होता है। तीन घंटे की एक अच्छी फिल्म वह बड़ा संदेश समाज के हर कोने तक पहुंचा सकती है, जिसे समझाने में वर्षों का समय बीत जाता है। इसलिए लेखकों और निर्देशकों को अपनी इस जिम्मेदारी को समझकर बेहतरीन सामग्री पर काम करना चाहिए।" — रवि किशन, अभिनेता एवं सांसद
जेन-जी पीढ़ी से जुड़ाव और मशहूर 'लापता लेडीज' का मजेदार किस्सा
आज की युवा पीढ़ी यानी जेन-जी के बीच रवि किशन की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है, जिस पर उन्होंने खुशी जताई। उन्होंने कहा कि युवा वर्ग उनकी सादगी और उनकी गलतियों को भी बहुत सहजता से स्वीकार करता है। वे उनमें किसी दूर के स्टार को नहीं, बल्कि अपने ही बीच के किसी इंसान को देखते हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी बहुचर्चित फिल्म 'लापता लेडीज' के इंस्पेक्टर मनोहर के किरदार से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प राज खोला।
उन्होंने खुलासा किया कि उस अनोखे पुलिस वाले के किरदार में पूरी तरह ढलने और उसके हाव-भाव को पकड़ने के लिए उन्हें फिल्म की शूटिंग के दौरान कुल 160 पान खाने पड़े थे। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने पर्दे पर उस किरदार को अमर बना दिया। इसके अलावा उन्होंने बंगाल चुनाव के दौरान होटल की लॉबी में गाए गए एक भजन 'कोटेश्वराय' का जिक्र किया, जो सोशल मीडिया पर रातों-रात वायरल हो गया और देश भर के युवाओं की जुबान पर चढ़ गया। अंत में उन्होंने कहा कि अभिनय के साथ-साथ अध्यात्म, ध्यान और निरंतर साधना ही एक कलाकार को जमीन से जोड़े रखती है।





